फिल्मी दुनिया – बाॅम्बे वेल्वेट – नमक कम, मिर्च ज़्यादा

20-05-15 Mano - Film - Bombay Velvet web

पिछले हफ्ते अनुराग कश्यप की फिल्म ‘बाॅम्बे वेल्वेट’ निकली। दर्शक फिल्म का इंतज़्ाार कई कारणों से कर रहे थे। रणबीर कपूर के चाहने वालों को तो अपने हीरो की नई फिल्म का बेसबरी से इंतज़्ाार था ही लेकिन फिल्म में पहली बार खलनायक के किरदार में लोग मशहूर निर्देशक करण जौहर को अभिनेता के रूप में देखने के लिए और भी उत्सुक थे। लेकिन सौ करोड़ के कारोबार के इस ज़्ामाने में इस फिल्म ने पहले हफ्ते में सिर्फ पच्चीस करोड़ कमाए।

तो आखिर क्या था इस फिल्म में जो दर्शकों को भाया नहीं? 1969 के बाॅम्बे शहर को दर्शाती ये फिल्म ढाई घंटे लम्बी है। डेढ़ सौ मिनटों में ऐसे कई पल होंगे जब आपका ध्यान इधर-उधर भटक जाएगा। फिल्म में अनुशका शर्मा क्लब में गाने वाली का किरदार निभा रही हैं। रणबीर कपूर और उनका दोस्त चिम्मन छोटी-मोटी चोरियां करके गुज़्ाारा करते हैं पर रणबीर बड़ा आदमी बनना चाहते हैं। इस मोड़ पर उन्हें मिलते हैं करण जौहर जो बाॅम्बे के एक पुराने अमीर परिवार से हैं पर धंधा मंदा चलने की वजह से खुद आड़े टेढ़े तरीकों से पैसे कमाने की कोशिश कर रहे हैं। रणबीर और करण जौहर की मुलाकात के बाद शुरू होती है फिल्म की लम्बी चैड़ी कहानी।

मुंबई के रंगीन इतिहास को इस फिल्म में मज़्ोदार तरीके से दिखाया जा सकता था लेकिन फिल्म खत्म हो जाती है और कोई भी सीन आपके ज़्ाहन में बसा नहीं रह जाता। दोस्ती, प्यार, दुश्मनी – सभी रिश्तों की कहानियां अधूरी सी लगती हैं। फिल्म के गानों में एक पुरानापन है जो मन को लुभाता है और गीता दत्त जैसी गायिका की यादें ताज़्ाी हो जाती हैं। पर कहीं ना कहीं मुंबई के आज की चकाचैंध को जिस बीते कल ने रूप दिया है, उसे कश्यप इस फिल्म में पूरी तरह से दिखा नहीं पाए।