पोस्टमॉर्टम घर हई जे जड़-जड़

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जड़-जड़ परल पोस्टमॉर्टम घर

सीतामढ़ी के पोस्टमॉर्टम घर हई जे जड़-जड़ परल हई अउर घर के अंदर बाहर एतना गंदगी फैलल हई जेकर कोई सीमा न हई। जब कि जे भी लास अबई छई जे ज्यादातर लावारिस लास रहई छई। लेकिन ओई घर के साफ-सफाई के लेल कोनो बजट न हई।
उहां के लोग विक्रम कुमार, सुशील कुमार कहलथिन कि हम सब त इहां पर चालीस, पचास वर्ष से रहई छी। पोस्टमॉर्टम घर के इहां से हटावे के लेल कतेक बेर जिला अस्पताल में आवेदन देली। कभी-कभी त तीन-चार दिन के लास अबई छई त पुरे मुहल्ला में बदबू देइत रहई छई। हमरा सब के घर त इहे हई कि करू केना छोड़के कहां जाऊ? इ जमीन रेलवे के हई। इ वार्ड नम्बर तेईस में परई छई। वार्ड पार्षद लक्ष्मी देवी के बहन के बेटा राजू मिश्रा कहलथिन कि हम सब भी कतेक बेर आवेदन देली लेकिन कोनो सुनवाई न होई छई।
शंकर मलिक कहलथिन कि पोस्टमॉर्टम के बाद बहतर घंटा इहां लास रखल जाई छई। जेकर गारजियन आयल त तुरते ले जाई छथिन। जिनकर गारजियन न आयल त तीन दिन के बाद लास के दफना देल जाई छई। एही गंदगी में केहुना काम करई छी।
डॉक्टर अरविंद कुमार शर्मा कहलथिन कि साफ-सफाई के लेल कोनो बजट न अबई छई। केहूनाहितो दस मिनट तक ओई घर में काम करई छी। अब सदर अस्पताल में ही पोस्टमॉर्टम घर बनतई।