पैसा कहाँ से आया, कितना आया? पैसों के मामले में राजनीतिक पार्टियाँ हों पारदर्शी

 

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भारतीय राजनीतिक दलों को कैसे चन्दा दिया जाना चाहिए ये सवाल सीधा काले धन और भ्रष्टाचार से जुड़ा है।  ये लगभग सभी जानते हैं कि कंपनियां बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट शुरू करती हैं।  इनके लिए  बड़े पैमाने पर ऋण लेती हैं।  और इस पैसे का एक भाग राजनीतिक दलों को चन्दा देने में जाता है। ये कंपनियों द्वारा अक्सर किया जाता है कि वे विदेशी सामग्री को बड़ी हुयी दर में खरीदा दिखा के विदेशी बैंकों में पैसा जमा करती हैं।  ताकि टैक्स से बच पाएं।  ये पैसा अलग अलग समय पर राजनीतिक दलों को चन्दा देने के लिए भारत आता है . आज के समय में बड़ी बड़ी कंपनियों  के ७.५ लाख करोड़ रूपये सार्वजनिक बैंकों में बकाया हैं . फिर भी कोई सरकार उनपर सख्ती नहीं कर सकती . क्योंकि वे राजनीतिक दलों को पैसे देते है . तो इसका इलाज क्या है? इसे ख़त्म करने के लिए राजनीतिक दलों को मिले चंदे को पूरी तरह पारदर्शक बन देना चाहिए . मगर ऐसा कैसे किया जाये?

हाल ही में सरकार ने कानून में बदलाव करके राजनीतिक दलों को दोषमुक्त कर दिया, जो स्पष्ट रूप से विदेशी योगदान (विनियमन) कानून २०१०  (FCRA) का उलंघन कर रहे थे . इससे भाजपा और कांग्रेस जैसे दल वेदांत जैसी विदेशी कंपनियों से कानूनन चन्दा ले सकते हैं . इस मुद्दे पर कई बार सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा सवाल उठाया गया है . वेदांत द्वारा दिए जा रहे चंदे पर सवाल करते हुए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया गया है . २०१४ में उच्च न्यायालय ने इस चंदे को फक्रा का उलंघन बताया था . उच्च्तम न्यायालय में भी इस मुद्दे पर याचिका दायर है .
केंद्र कभी भी इस बात का जवाब नहीं दे पाया की कैसे बड़े दल वेदांत जैसी ग्लोबन कंपनियों से बिना FCRA के अंतरगत अनुमति के चन्दा  ले पाते हैं . ऐसे में सरकार द्वारा कानून में बदलाव करके चंदे को इसके अंतर्गत लाना अपने दोष को मान लेने जैसा ही है.
इसका मतलंब है कि वेदांत FCRA  से स्वतंत्र है और अपनी मर्ज़ी से चन्दा दे सकती है . बस इसके अधीनस्त / पूरक  भारत में मौजूद  कंपनी को  FDI  के अंतर्गत पंजीकृत होना चाहिए . इस कानून में बदलाव पर विवाद लाज़मी है . क्योंकि विदेशी चंदे से सम्बंधित कई सवाल आज भी उच्च्तम न्यायालय में दायर हैं . कंपनियों द्वारा दलों को दिए चंदे का मुद्दा दोबारा विवाद में आ सकता है.
वैश्वीकरण के बाद से विदेशी कंपनियों और उनकी अधीनस्त/ पूरक कंपनियों के बीच अंतर की रेखा हल्की हो गयी है . मारुती ऑटोमोबाइल्स और हिन्दुस्तान लीवर काफी हद तक स्थानीय कंपनियां है मगर जिनका स्वामित्व विदेशी कंपनियों के पास है . तो क्या उन्हें राजनीतिक दलों को पारदर्शी रूप से चन्दा  देने का हक़ होना चाहिए? ये एक मुश्किल सवाल है . अगर उदारता से देखे तो एक साफ़ सुथरी  औद्योगिक संरचना के पक्ष में तर्क दिया जा सकता है . जिसमे राजनीतिक दल नहीं बल्कि राज्य चेकों से ऐसी कंपनियों से चन्दा  प्राप्त करें .
इस समय उच्च्तम न्यायालय जो इस मुद्दे पर विचार कर रहा है केंद्र से राजनीतिक दलों के चंदे में पारदर्शिता लेन के लिए कह सकता है .  इसका एक तरीका ये है कि वह केंद्र से राजनीतिक दलों और चुनावों के चंदे  के लिए सेस या  टैक्स लगने के लिए कहे. अगर पांच साल तक ज़्यादा कमाई वाले व्यक्तियों और कंपनियों से 0.5  प्रतिशत का भी टैक्स जमा किया जाता है तो इससे 60, 000 करोड़ रूपये की राशि जमा हो जाएगी . जिसका प्रबंधन चुनाव आयोग देख सकता है .
अगर चुनाव आयोग को राजनीतिक चंदे का बन्दोवस्त करने वाली संस्था बन दिया जाये तो राजनीतिक दलों को प्रत्यक्ष रूप से कंपनियों के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी . अगर चंदे को आधिकारिक बनदिया जाये तो काले धन की भूमिका भी काफी घट जाएगी.  ये एक अच्छी शुरुआत होगी. इसका अलावा ऐसा करने से विदेशी कंपनियों के आधीन/ पूरक कंपनियां के चंदे में योगदान देने में हर्ज नहीं होगा. अगर इतना ही कर दिया जाये तो राजनीतिक चंदे के लेन देन की  व्यवस्था  में एक बड़ा सुधार  हो जायेगा.
साभार: एम के वेणु / द वायर / http://thewire.in/2016/04/17/time-to-institutionalise-funding-of-political-