दुबारा से पलट के देखै के जरुरत

सरकार कुपोषण का खतम करैं खातिर सन् 1995 मा आंगनबाड़ी केन्द्र मा पोषाहार दें के योजना शुरू करिस। केन्द्र मा जीरो से लइके छह बरस के बच्चा, धात्री मेहरिया, गर्भवती मेहरिया अउर किषोरिन का पोषाहार दीन जई। अगर पता कीन जाये तौ आंखिन के सामने तुरतै सच्चाई नजर आ जात हवै कि आंगनबाड़ी केन्द्र मा का, गड़बड़ी चलत हवै। पहिले बात करित हन पहाड़ी ब्लाक के मिर्जापुर गांव के। हिंया केन्द्र तौ हवै, पै सहायिका बच्चन का लेवावैं नहीं जात हवै। या कारन मड़ई सोचत हवै कि आखिर इनतान काहे होत हवै। जबैकि आंगनबाड़ी सहायिका बच्चन का बोला के लाई। केन्द्र मा पंजीरी, लाई, चना, मीठा दलिया अउर नमकीन दलिया मिली।
यहिनतान मऊ ब्लाक, गांव हटवा मा भी समस्या हवै। अगर सरकार पोषाहार देत हवै तौ आंगनबाड़ी इनतान काहे करत हवै। आखिर पंजीरी अउर लाई, चना, मौसमी फल इं सबै कहां जात हवै। जबै कि बाल विकास परियोजना विभाग वाले कहत हवैं कि जिला मा आंगनबाड़ी कुल नौ सौ अड़तालिस अउर मिनी आंगनबाड़ी दुइ सौ ग्यारह हवैं। केन्द्र मा एक बच्चे का सत्तर ग्राम दलिया, पच्चीस ग्राम चीनी, अउर एक सौ बीस ग्राम पंजीरी धात्री अउर गर्भवती मेहरियन का एक सौ चाालिस ग्राम अउर किषोरिन का एक सौ पचास ग्राम पंजीरी दीन जात हवै। अगर सरकार के तरफ से येत्ती मात्रा हवै तौ पंजीरी केन्द्र मा काहे नहीं बांटी जात हवै। यहिके जवाबदेही कउन देइ? आंगनबाड़ी सहायिका या फेर विभाग? आपन बनाई गे या योजना का सरकार दोबारा से पलट के काहे नहीं देखत आय। जबै कि सरकार योजना का पलट के न देखी तबै तक यहिनतान कउनौ योजना का लाभ बहुतै कम पात्र मड़इन का मिली।