तो बयालिस लोगों को किसने मारा?

(फोटो साभार: मुकुल दुबे)
(फोटो साभार: मुकुल दुबे)

मेरठ, उत्तर प्रदेश। हाशिमपुरा जिले में हुए नरसंहार के सभी आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च को पर्याप्त सबूतों के न होने के कारण छोड़ दिया गया है। सवाल यह उठता है कि फिर इन लोगों को किसने मारा? 24 मार्च को दिल्ली के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में इस मामले में इंसाफ के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘जस्टिस फार हाशिमपुरा कमेटी’ ने एक बैठक की। यहां मौजूद मरने वालों के परिवार के लोगों और मौके पर मौजूद गवाहों ने यह लड़ाई जारी रखने की घोषणा की है।
हाशिमपुरा जिले में 22 मई 1987 को बयालिस अल्पसंख्यकों की हत्या की गई। इस हत्या के गवाह मौजूद हैं। इन्होनें इस पूरे नरसंहार को अपनी आंखों से देखा। मगर कोर्ट में यह साबित नहीं हो सका कि आखिर इन बयलिस लोगों की हत्या किसने की? घटना के गवाह मोहम्मद उस्मान, ज़ुल्फिकार नासिर और नसीम आरिफ इस बात को कानून के सामने कई बार कह चुके हैं कि सैंतालिस लोगों से भरे ट्रक को पी.ए.सी. के लोग हिंडन नदी ले गए। वहां रात के अंधेरे में इन पर गोली बरसाकर लाशों को नदी में बहा दिया गया। वह भी मारे जाते मगर बच गए। सुबह इन बयालिस लोगों की लाशें मिलीं।
मई 2000 में उन्नीस में से सोलह पी.ए.सी. जवानों ने कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 2002 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट से दिल्ली के तीस हज़ारी कोर्ट में ट्रांसफर हुआ। 2007 में दो गवाहों और मरने वालों के परिवारों ने सूचना के अधिकार के तहत इस मामले में दोषी लोगों से जुड़े कुछ दस्तावेज़ मांगे।
लेकिन जो जानकारी मिली वो चैंकाने वाली थी। सभी सोलाह पी.ए.सी. के जवान नौकरी पर थे। उन्हें छह महीने से डेढ़ साल के लिए ही बर्खास्त किया गया था। उनके सालाना रिपोर्ट में सबका चरित्र अनुशासनात्मक लिखा गया था। किसी की रिपोर्ट में इस नरसंहार का जिक्र तक नहीं था। और जब फैसला आया तो इंसाफ गायब था।

‘1987 में घटना के कई दिनों तक जिस तरह का मातम हमारे घरों में फैला था। वैसा ही मातम आज फिर फैला है। अट्ठाईस साल तक इंसाफ का इंतजार करने के बाद हमें अदालत ने फिर आंसू ही दिए। लेकिन लड़ाई जारी रहेगी। उसने बताया कि 2008 में हमें मुआवज़ा मिला भी तो पूरे घर में बांट दिया गया। पूछने पर कहा कि यह मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के अनुसार बांटा गया है।’
– जैबुनिसां
‘हमारी चार बहनों के एक ही भाई था। घर में शादी का माहौल था। लेकिन शादी की जगह हमने गमीं मनाई। इतने लंबे इंतज़ार के बाद फिर नाइंसाफी हुई।’
– नसीमा बानो
‘बेटा और शौहर दोनों ही नरसंहार में मारे गए। हम न्याय के दिन का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन जब फैसला आया तो लगा दोबारा उनकी हत्या हो गई।’
– ज़रीना