जनता या सांसद – किसके लिए ‘सांसद निधि’

(फोटो साभार: अम्बुज सक्सेना | विकिपीडिया)
(फोटो साभार: अम्बुज सक्सेना | विकिपीडिया)

मई 2014 में नई सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र म¨दी ने विकास के माडल को सेट करने के लिए एक पहल की। सुनने में यह योजना बेहद लुभावनी थी। इस योजना का नाम ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ दिया गया। इसमें हर सांसद को अपनी संसदीय सीट का एक गांव गोद लेना था। इस गांव का विकास करके इसे एक आदर्श गांव बनाना था। लेकिन ज्यादातर गांव विकास के रास्ते में एक कदम भी आगे नहीं बढ़े हैं।

वैसे भी ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग तो अपने सांसदों को सिर्फ चुनाव के दौरान ही देखते हैं। सरकारी योजनाओं के आंकड़ों का दस्तावेज तैयार करने वाले मंत्रालय की वेबसाइट में दर्ज सूची को देखें तो पचपन प्रतिशत सांसदों ने अपनी सांसद निधि का एक भी रुपया पिछले एक साल में खर्च नहीं किया। इस योजना में यह भी कहा गया था कि गांव के विकास में इस निधि का पैसा खर्च किया जाएगा। लेकिन इन सांसदों के खातों को देखकर लगता है कि गोद लेने के बाद सांसद कभी यहां लौटे ही नहीं। अगर दोबारा आते तो खस्ताहाल गांवों पर तरस खाकर शायद अपने खाते खोलते।

नेताओं की यह परंपरा बहुत पुरानी है कि चुनाव के दौरान ही नेता अपने क्षेत्रों में जाते हैं। आजमगढ़ जिले में तो कुछ महीने पहले मुलायम सिंह यादव की फोटो लगाई गई कि हमारा सांसद लापता है, जो इनका पता बताएगा उसे ईनाम दिया जाएगा। यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि यह सांसद निधि के पांच करोड़ रुपए विकास के कामों के लिए ही सरकार इन्हें देती है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि यह रकम अगले चुनाव की तैयारी के लिए नेता बचाकर रखते हैं।