चैथे स्तंभ का ढिढोरा पीटना बंद किया जाए

KL Logo 2इस लेख को खबर लहरिया के एक पत्रकार ने लिखा हैं। यह लेख उनकी राय और अनुभव पर आधारित है। किताबो के पन्नों में इतिहास बन चुका लोकतंत्र का चैथा स्तंभ मीडिया अब खतरे में डूबता नजर आ रहा है। मीडिया पर बढ़ते अत्याचार और हत्या जैसे मामले यह कहने को मजबूर कर रहीं हैं कि क्यों जबरजस्ती चैथा स्तंभ का ढि़ढ़ोरा पीटा जा रहा है। अगर चैथा स्तंभ खतरे में है तो यह माना जाना संभव है कि लोकतंत्र भी खतरे में है। यह सब इसलिए संभव है कि लोकतंत्र के बाकी तीन स्तंभ (कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका) चैथे स्तंभ को गम्भीरता से नहीं लेना चाहते। वह सब मिल कर इसको तोडने में जी जान लगा रहें हैं। ताकि इन तीन स्तंभों को अपनी मनमानी करने की खुली आजादी मिल जाए। वैसे भी सच्चाई और ईमानदारी के मायने इन स्तंभों ने खो दिये हैं। और इतना ही नहीं अब जड़ से उखाड फेकने की ठान लिए हैं।
केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार और चाहे जिले के अधिकारी हों अपने भाषण में मीडिया को बरगलाने के लिए मीडिया के साथ अच्छे से पेश आने की बात करते हैं। इसके खिलाफ होने वाले व्यक्तियों के ऊपर कारवाही करने की भी बातें की जाती हैं। पर मीडिया को तो किसी भी तरह से नहीं लगता कि सरकारें उसके लिए जो बोलती हैं वह करती भी हैं। अगर सरकारें मीडिया के प्रति सच में गम्भीर होतीं तो आय दिन होने वाली घटनाएं क्यों बढ़ती जातीं?
अगर मैं दूसरी तरफ सोचूं तो मीडिया के लोग ही मीडिया का साथ नहीं देते। किसी किसी जिले में तो प्रेस क्लब कमिटी ही नहीं है। जहां पर इस तरह की समस्याओं को रखने का मंच मिले। सब अपनी अपनी खबरों को कवर करने में हाथ पैर मारते रहते हैं। इसको संपादक का दबाव कहा जाय या फिर खबर कवर करने का कम्पटीशन। जब कभी अपने हक और अधिकार पर सामने आने की बात आती है तो कोई जान बूझ कर सामने नहीं आना चाहता और कोई कोई तो अपने संपादक के डर से बात करने से कतराते हैं।
अगर हम अंबेडकर नगर में जन संदेश टाइम्स के ब्यूरो चीफ करूण मिश्रा की हत्या की बात करें तो उसमें हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए। बड़े स्तर के मीडियाकर्मी है इसलिए बात पूरे राज्य और देश में फैल गई।
कस्बों और छोटे शहरों में पत्रकारें पर आय दिन घटनाएं होती रहती हैं, जिसके कोई मायने नहीं हैं। इस तरह से एक घटना की शिकार मैं भी हूं। जब पुलिस अधिकारियों ने साफ कह दी कि वह उस व्यक्ति से खुद डरती हैं, तो कारवाही क्या करेगी। मुआवजे के नाम पर दी जाने वाली राशि से कार्यवाही कर सरकारें अपनी ताकत का दुरूपयोग तो नहीं कर रही हैं? या फिर मीडिया के लिए हेल्प लाइन नंबर शुरू करना ही काफी है? सरकार को मीडिया की सुरक्षा को गम्भीरता से लेते हुए बने कानून को और सख्त करने की जरूरत है।