चिट भी सरकार के, पट भी सरकार के

fasal kharabहर जघा भेदभाव का सामना गांव के भोली भाली जनता का करैं  का परत है। चाहे कउनौतान के नियाव पावैं के बात होय चाहे अपने हक के लड़ाई होय। या फेर खेती किसानी के बरबाद फसल के मुआवजा के बारे मा होय। या समय यहै हाल बुन्देलखन्ड के किसानन के ऊपर का है।

चित्रकूट अउर बांदा के बडे़ कास्तकार के किसानन का सरकार मुआवजा दई दिहिस है, पै छोट किसान मुआवजा के आस मा अब भुखमरी के कगार मा आ गे है। उंई मुआवजा के खातिर दर-दर की ठोकर खाय का मजबूर  है। पता नहीं कि सरकार किसानन के समस्या का लइके का राजनीति खैले चाहत है। आखिर हमेशा जीत तौ सरकार के ही होत है। कहै का मतलब कि चिट भी सरकार के पट भी सरकार के।

किसानन के खेती मा नींक पैदावारी होत है, तौ सरकार उनके अनाज का सस्ते दाम मा खरीद के आपन गोदामन का भर कें मालामाल रहत है। अगर अकाल पड़ गा तब तौ सरकार के अउर चांदी रहत है। किसानन का मिलै वाली राहत से सबसे बड़ी कमाई सरकार के कर्मचारिन का होत है। फेर वहिसे बड़ा फायदा किसानन का  बेचैं वाली खादबीज से होत है। भोलेभाले किसानन का खाद बीज बेच के दुगुना कमाई कीन जात है। वहै बीज से कइयौ दरकी नींक फसल भी नहीं होत है। अगर किसान खराब फसल का सरकारी मंडी मा बेचैं जात है तौ बीज से पैदा भा अनाज का सरकार खराब कहिके नहीं लेत है। अगर लेत भी है तौ बहुतै सस्ते दाम मा अउर वहिका भुगतान भी समय से नहीं करत। इनतान से सरकार किसानन के साथ मा हरतान का भेदभाव कइके परेशान करत है। आखिरकार सरकार किसानन के समस्या का हल करैं का सही उपाय कबै निकाली। या फेर आवैं वाले चुनाव मा मुद्दा बनाई?