चर्चाएं नई नज़र से – विविधताएं भाती हैं तो फिर संबंध क्यों एक से हों?

सादिया सईद
सादिया सईद

सादिया सईद दिल्ली की निरंतर संस्था के साथ दस सालों से काम कर रही हैं। सादिया ने जेंडर और शिक्षा पर आधारित कई किताबों के लेखन, सम्पादन, और डिज़ाइन पर काम किया है। 

विविधताएं हम अक्सर पसंद करते हैं। खाना हम एक तरह का खाते खाते परेशान हो जाते हैं। कुछ नया चाहिए होता है। मगर अगर यौनिक रिश्तों को देखें तो हम एक ही तरह के यौनिक रिश्तों को मान्यता देते हैं। वे हैं विषमलैंगिक यानी मर्द औरत के बीच। मगर रिश्ते तो और तरह के भी हंै। जैसे समलैंगिक और द्विलैंगिक। समलैंगिक यानी वे लोग जो अपने सेक्स औरत औरत की तरफ और पुरुष पुरुष की तरफ आकर्षित होते हैं। और द्विलैंगिक यानी वे लोग जो अपने और दूसरे सेक्स दोनों के प्रति आकर्षित होते हैं।

समलैंगिकता के बारे में कई गलत धारणाएं हैं। कई बार बोला जाता है कि इस तरह की यौनिकता वाले लोग मानसिक रूप से बीमार हैं। उनके साथ मारपीट की जाती है। डॉक्टर के पास ले जाकर बिजली के झटके देकर ठीक करने की कोशिश की जाती है। यह मान्यता बिलकुल गलत है विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सालों पहले मानसिक रोगों की सूची से समलैंगिकता को हटा दिया है।

ऐसा कहा जाता है कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। ये पश्चिमी देशों से आई है। जबकि भारत के पुराने मंदिरों, साहित्य, शादियों में गाए जाने वाले गानों और कहानियों में हर जगह इसकी झलक मिलती है।

ये भी कहा जाता है कि हर धर्म इसके खिलाफ है जबकि कई धर्मों में इसके बारे में कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है जैसे हिन्दू और बौद्ध धर्म। और अगर कुछ धर्मों ने स्पष्ट बोल भी दिया है तो क्या लोगों को समलैंगिकों पर अत्याचार करने की खुली छूट मिल गयी है?

दुनिया में कितने समलैंगिक हैं इसकी गिनती करना मुश्किल है। क्योंकि हो सकता है कि उनमें से ज़्यादातर डर की वजह से सामने न आएं या उन्होंने ये शब्द सुना ही न हो। उनकी संख्या चाहे जितनी भी हो। सच तो ये है कि समान अधिकार उनका हक हैं। समाज में फैली गलत धारणाओं को दूर करना और उनके खिलाफ भेदभाव को खत्म करना ज़रूरी है ताकि समलैंगिक भी सामान्य जीवन जी सकें।