चर्चाएं नई नज़र से – दोस्त नहीं दुश्मन हैं, खरपतवार नाशक

डॉक्टर मीरा शिवा (फोटो साभार: जेनीवा हेल्थ फोरम)
डॉक्टर मीरा शिवा (फोटो साभार: जेनीवा हेल्थ फोरम)

डाक्टर मीरा शिवा मेडिकल डाक्टर हैं। जन स्वास्थ्यए महिलाओं के स्वास्थ्यए खाद्य और पोषण सुरक्षा जैसे  मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही हैं। इनका मानना है कि खाने के हक का सीधा संबंध सामाजिक और जेंडर न्याय से है। वह हेल्थ एंड इक्यूटी इन सोसायटीध् थर्ड वर्ड नेटवर्क की कोआर्डिनेटर हैं। डाइवर्स वुमेन फार डाइवर्सिटी संस्था की संस्थापक और इसकी स्टीयरिंग कमेटी की सदस्य हैं।

खेतों में मुख्य फसलों के बीच में कई तरह के घास-फूस नज़र आते हैं। इन्हें कहते हैं खरपतवार। इन्हें फसलों के बीच से निकालना ज़रूरी होता है। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो फसलों को मिलने वाली धूप और पानी का कुछ हिस्सा इनमें भी बंट जाएगा। मगर किसी पुराने किसान से पूछो तो वह बताएगा कि यह खरपतवार कितने काम के हैं। कई तरह की औषधियों, जानवरों के चारे और ईंधन में इनका इस्तेमाल होता है। कई साग तो खरपतवार ही होते हैं। मगर आजकल बाज़ार में बहुत आक्रमक ढंग से प्रचार हो रहा है कि इनसे छुटकारा पाने के लिए खरपतवार नाशक प्रयोग करने चाहिए। जबकि पारंपरिक खेती में इन्हें हाथ से निकाला जाता था। हां वक्त ज़रूर लगता था लेकिन इसका सही उपयोग भी होता था। गाय, बकरी या भेड़ों का यह पसंदीदा चारा हुआ करता था।

अब ज़रा एक बेहद खास खरपतवार बथुआ की बात करें। साग के शौकीन लोगों को इसका ज़रूर पता होगा। इसमें बड़ी मात्रा में आयरन पाया जाता है। भारत जैसा देश जहां ज़्यादातर औरतें खून की कमी का शिकार हैं, वहां इसे यूं ही खत्म करना क्या ठीक है? गांवों की औरतों के लिए तो बिल्कुल मुफ्त की सेहतंद खुराक है, यह। धान के खेत में उगने वाली एक ऐसी ही गांठदार घास होती है मोथा। इसका उपयोग बुखार, पाचन संबंधी बीमारियों में होता है। दूब भी ऐसी ही घास है इसका उपयोग भी कई औषधियों में होता है। ऐसी सैकड़ों खरपतवार हैं जिनका प्रयोग हम अपने लाभ के लिए सदियों से करते आए हैं।

मगर अब इन्हें बेकार साबित करने और इन्हें खत्म करने वाले रसायनों को हमारा दोस्त साबित करने के लिए खूब प्रचार हो रहा है। मोटे तौर पर इनसे क्या नुकसान हो रहे हैं ज़रा देखें – पहले तो यह रसायन हमारे स्वास्थ्य को खराब कर रहे हैं। यह रसायन खेतों की मिट्टी में घुसकर उसकी उत्पादन क्षमता पर भी नकारात्मक असर डाल रहे हैं। चारे और ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले खरपतवार में भी रसायन ज़हर घोल रहे हैं। इसे खाकर जानवर बीमार पड़ रहे हैं तो ईंधन के सबसे करीब रहने वाली औरतों के स्वास्थ्य पर इसका खराब असर पड़ रहा है। उदाहरण के लिए भारत में राउंडअप नाम का रसायन बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है। इसका वैज्ञानिक नाम ग्लाइकोफोसेट है। श्राीलंका देश ने इस पर शोध किया और पाया कि इससे किडनी की गंभीर बीमारियां हो रही हैं। वहां इस पर रोक लगा दी गई है।