चर्चाएं, नई नज़र से – असलियत से कब तक मोड़ेंगे मुंह?

जया शर्मा
जया शर्मा

जया शर्मा जेंडर और यौनिकता के मुद्दों पर लिखती हैं, शोध करती हैं और ट्रेनिंग देती हैं। उन्होंने बीस साल निरंतर संस्था में जेंडर और शिक्षा पर काम किया।

महिला दिवस के अगले दिन मैं रेडियो पर गाने सुन रही थी। हर गाने के बाद एक औरत की शैतानी भरी आवाज़ आती। वह कहती चलिए एक बार फिर सिंह साहब को फोन लगाते हैं। घंटी सुनाई देती। औरत रोंदू सी आवाज़ में कहती – सिंह साहब फोन उठाइए।
यह वही सिंह साहब हैं जो दिसंबर 2012 में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के आरोपियों के वकील हैं। इन्होंने ही कहा था – ‘अगर मेरी बेटी या बहन शादी से पहले इस तरह के संबंध में होती, तो मैं उस पर पेट्रोल डालकर आग लगा देता।’ यह सब सुनने को मिला ‘इंडियाज़ डाॅटर’ (हिंदुस्तान की बेटी) नाम की फिल्म में। हम उसी फिल्म की बात कर रहे हैं जिसे दिखाने पर सरकार ने बैन यानि रोक लगा दी है। फिल्म देखना अब जुर्म है, लेकिन इसके बाद भी लाखों लोग फिल्म देख रहे हंै।
सरकार और कुछ लोग कह रहे हैं कि यह फिल्म देश की इज़्ज़त कम कर रही है। इसमें बलात्कार को लेकर जिस तरह से चर्चा हुई है, उससे देश की एक नकारात्मक छवि दुनिया में बनेगी। सवाल यह उठता है कि क्या देश की इज़्ज़त बचाने के लिए असलियत को छिपाया जाना चाहिए? झूठी शान को बचाने के बदले क्या फिल्म में दिखाई गई मानसिकता पर विचार करने और उसे बदलने पर ज़ोर नहीं देना चाहिए? औरतों के खिलाफ होने वाली हिंसा से भी ज़्यादा खतरनाक है, इस हिंसा को छिपाना और उसे तर्कों से सही साबित करना।
इज़्ज़त, बदनामी वही शब्द हैं जो घर-घर में पत्नी, बहन, बेटी को सुनाए जाते हैं। ‘तेरी वजह से नाक कट गई’, ‘किसने कहा इतना सजने संवरने को’, ‘क्यों गई थी अकेले बाहर’ – सिंह साहब ने भी कोई नई बात नहीं की। फिर भला इस फिल्म पर बैन क्यों?
जब भी कोई फिल्म, किताब या कला बैन होती है, उस पर रोक लगाई जाती है, तो सरकार का तर्क होता है कि यह ‘गलत’ तस्वीर दिखा रहे हैं। इससे लोगों का ‘अपमान’ होता है। लेकिन ये ‘गलती’, ये ‘अपमान’ हमारे समाज की सच्चाइयां हैं। उन पर खुल कर बहस होनी चाहिए। असलियत को ढकने से क्या फायदा होगा? और किसका फायदा होगा? शायद उन्हीं का होगा जो असलियत बदलना ही नहीं चाहते।