चर्चाएं, नई नज़र से – अपनी आवाज़ उठाने का दिन

पूर्वा भारद्वाज
पूर्वा भारद्वाज

पूर्वा भारद्वाज लंबे समय से जेंडर, शिक्षा, भाषा आदि मुद्दों पर काम कर रही हैं। साहित्य में उनकी खास रुचि है। इन दिनों वे दिल्ली में रह रही हैं।

8 मार्च आ रहा है। हम खुश हैं क्योंकि यह महिला दिवस है। और यह पोस्टर है 8 मार्च 1914 का। यह महिला दिवस के इतिहास को बताता है। लगभग 100 साल पुराना इतिहास। 1914 से ही इस तारीख को कई देशों में महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा था। जर्मनी देश के इस पोस्टर में एक औरत है जिसने हाथ में झंडा उठा रहा है। उसकी मुट्ठियां कसी हैं और चेहरे पर दृढ़ता, आत्मविश्वास है। वह वोट देने का अधिकार मांग रही है। इससे पता चलता है कि यह अपनी आवाज उठाने का दिन है। अपने हक मांगने का दिन है। 1977 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसे महिला अधिकार और विश्व शांति का दिवस घोषित कर दिया।
महिला दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। यानी पूरी दुनिया में यह दिन मनाया जाता है। धीरे धीरे इसकी धूम बढ़ती जा रही है। यह उत्सव का दिन है। अपनी उपलब्धियों की खुशी मनाने का दिन है। अपनी एकजुटता दिखाने का दिन है। मिलकर लड़ने का दिन है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बाकी दिन हम औरतों का संघर्ष नहीं रहता है। हमारा संघर्ष तो हर जुल्म के खिलाफ है। इसलिए संघर्ष हर पल हर जगह जारी है। घर के भीतर घर के अंदर सभी जगह संघर्ष है। परायों से है तो अपनों से भी है। काम करने की जगह में है तो रिश्तों में भी है।
यह महिला दिवस हमें अपने सपनों को पूरा करने का हौसला देता है। यह याद दिलाता है कि हर अन्याय और दमन के खिलाफ हमें खड़ा होना है। क्योंकि रास्ता आसान नहीं है, इसलिए हमें एक दूसरे का हाथ थामकर चलना है। बहुत बार हार होती है तो कई बार जीत भी मिलती है। हमारे हौसले और लगातार संघर्ष से हमें कई हक मिले हैं। आज औरतें चांद-तारों पर जा रही हैं। सरकार चला रही हैं। काम कर रही हैं। अखबार निकाल रही हैं। हालांकि कई और अधिकार लेने बाकी हैं। मगर भरोसा है, यह भी हम हासिल कर ही लेंगे।