गांव गया था…

कैलाश गौतम का जन्म साल 1944 में बनारस के चंदौली गांव में हुआ था। कैलाश गौतम की कविताओं में छलकती है ग्रामीण और सामाजिक मुद्दों की एक खास समझ। एक हास्य कवि की भूमिका में हुए मशहूर, इन्होंने अपने काम की शुरूआत इलाहाबाद आकाशवाणी से की थी। भोजपुरी भाषा में भी इनकी अनेक कविताएं लोगों को बहुत पसंद हैं। ये लोकप्रिय कवि साल 2006 में चल बसे पर अपने नाछे छोड़ गए अपने लेखों का अनमोल भंडार। उस ही में से पेश है उनकी एक कविता से कुछ पंक्तियां।

रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम रहीम देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर…