क्या है सरकार की असफल योजनाओं का सच?

अखिलेश यादव की सरकार का दावा है कि उत्तर प्रदेश की 75 प्रतिशत आबादी खाद्य सुरक्षा अधिनियम का लाभ उठा रही है, यानी 1.6 करोड़ लोग या लगभग 40 लाख परिवार इस योजना से भरपेट भोजन पा सकेंगे।
लेकिन योजना के लागू होने से पहले ही इसमें कई दिक्कतें दिखाई दे रही हैं। खबर लहरिया की रिपोर्ट और हाल ही में किये गये सर्वे के अनुसार इस योजना का लाभ गृहस्थ पात्रों को छोड़कर सब उठा रहे हैं। जिनमें कोटेदार, लेखपाल और गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार शामिल हैं। चित्रकूट, बांदा, महोबा और हमीरपुर के लगभग 30 प्रतिशत पात्र इस योजना का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि सरकार ने इन 40 लाख परिवारों की गिनती कैसे की है? सरकार द्वारा लागू की गईं तमाम समाज-कल्याण योजनाओं के मानक तय है, जिनमें से सबसे प्रमुख है पात्रों का चयन। इन मानको के अनुसार, सरकार यह तय करती है कि कौन गरीबी रेखा के नीचे आते हैं और कौन ऊपर। अगर सरकार इन्ही मानको पर काम करे तो योजनाओं के लाभ अपात्रों को नहीं मिल पाएंगे।
दिक्कतें सरकार द्वारा की गई जनगणना से ही शुरू हो गई थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक परिवारों को बीपीएल, एपीएल में विभाजित किया गया है। लेकिन जनगणना की जानकारी लेने हर घर, हर गांव लेखपाल और अध्यापकों से लेकर आंगनवाडी और आशा कार्यकर्ताएं जाते हैं। जिनका काम संदिग्ध लगता है।

पात्रता के मानक

अन्त्योदय कार्डः महिला मुखिया, विधवा महिला, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति, विकलांग, साठ साल से अधिक उम्र के व्यक्ति जिनके जीविकोपार्जन का कोई साधन ना हो और सभी आदिवासी जनजातिय परिवार।
अपात्रता के मानकः समस्त आयकर दाता, चार-पहिया वाहनचालक, ट्रेक्टर, हार्वेस्टर मालिक, जिनके घरों में एसी या 5 केवीए का जनरेटर हो, जिनकी 7.5 एकड़ से अधिक सिंचित ज़मीन हो, जिनकी सालाना आय दो लाख (ग्रामीण) या तीन लाख (शहरी) रुपये हो, या शहर में सौ वर्ग मीटर का आवासीय फ्लैट या कॉर्पोरेट एरिया का व्यासायिक क्षेत्र हो।

खबर लहरिया की रिपोर्ट के अनुसार, गांवों में खासकर बांदा जिले में ज्यादातर घरेलू पात्रों को राशन नहीं मिल रहा है, अन्त्योदय सूची में गरीब परिवार बहुत कम शामिल हो रहे है। अब समाजवादी सुखा राहत पैकेट भी सही पात्रों को नहीं मिल रहा है।
लाभार्थीयों की सूची बनाने वाले लेखपाल, कोटेदार और प्रधान हैं जो अपने हिसाब से उनका चयन कर राशन और राहत किट बांट रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार से भरी हुई है। कहीं सत्ताधारी लोग अपने चहेतों और परिवार से जुड़े लोगों को बीपीएल सूची में शामिल करते है, तो कहीं पैसे की लेनदेन से लोग बीपीएल सूची में शामिल हो रहे है।
इसी त्रुटिपूर्ण तरीके से अन्त्योदय परिवारों की सूची भी बनती है और इसी तरह वास्तविक बीपीएल और अन्त्योदय परिवार सूची से बाहर रह जाते है। इन योजनाओं का बेडागर्क तब हो जाता है जब यही सूची सरकारी रिकॉर्ड में चढ़ाई जाती हैं और इन सूचियों के बलबूते ही सरकार अपनी योजनाओं की घोषणा करती है। जो वास्तविक पात्र है वह भूखे मर रहे है, जबकि अपात्र योजनाओं का लाभ उठा रहे है।
सच यही है कि जब तक पंचायत स्तर पर कड़ी जांच नहीं होगी तब तक पात्रों को बीपीएल कार्ड का सपना देखना बंद करना होगा या भारी इंतज़ार करना पड़ेगा।

मीरा देवी खबर लहरिया की पत्रकार है और वह चार जिलों के दौरे में शामिल थी।