क्या भ्रष्टाचार पर नए कानून से भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगा पायेगी सरकार?

साभार: विकिपीडिया

भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधित) विधेयक 2018 दोनों सदनों से पास करा लेने के बाद  सरकार का दावा है कि सिस्टम को साफ सुथरा बनाने और उसमें पारदर्शिता लाने में इस कानून से बड़ी मदद मिलेगी और कानून में मौजूद कई कड़े प्रावधान भ्रष्टाचार निवारक का काम करेंगे।

दरअसल सरकार कई प्रावधानों में फेरबदल कर और नए प्रावधान को समाहित कर ऐसा मान रही है कि भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधित) विधेयक 2018 प्रधानमंत्री के उन दावों को पुख्ता करता है जिसके तहत उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचारियों को उनके कृत्यों के लिए कड़ी सजा का दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। साथ ही ईमानदार और मेहनतकश लोगों के लिए भयमुक्त वातावरण का माहौल बनाकर उन्हें बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।

बिल में मौजूद कई प्रावधान जैसे रिश्वत देने वाले और लेने वालों पर आरोप सिद्ध होने के बाद सजा का प्रावधान 3 साल से 7 साल तक जुर्माने के साथ कर दिया गया है जिसके लिए पहले महज 6 महीने की सजा भर थी और अधिकतम सजा का प्रावधान 3 साल का था। इतना ही नहीं अभ्यस्त अपराधियों को कम से कम 5 साल और ज्यादा से ज्यादा 10 साल तक की सजा प्रावधान किया गया है वो भी जुर्माने के साथ।

सरकार कानूनी पारिश्रमिक के अलावा किसी भी तरह के फेवर को जैसे किसी भी प्रकार का गिफ्ट, अनुचित लाभ या बुरी नियत से स्वीकार किए जाने वाले पैसे या गिफ्ट को भ्रष्टाचार की परिधि के भीतर रखा है। वहीं रिश्वत लेने वालों के साथ-साथ रिश्वत देने वालों को भी समान रूप से दोषी माना है। सरकार सिर्फ उन लोगों को सजा के प्रावधान से बाहर रख रही है जिनसे रिश्वत जबरन वसूली जाएगी और वो सात दिनों के भीतर रिश्वत दिए जाने की सूचना संबंधित विभाग को दे पाने की हिमाकत कर सकेंगे।

इस कानून में कॉरपोरेट घरानों के लिए भी सजा का प्रावधान है जिनके एजेंट और इंप्लॉय उनकी सहमति से रिश्वत देने का काम कॉरपोरेट के फायदे के लिए करेंगे। साथ ही कानून स्थापित करने वाली संस्थाएं और ताकतवर होकर गैर कानूनी संपत्ति को संलग्न और जब्त करने का काम करेंगीं।

किसी भी आरोपित सरकारी कर्मचारी का ट्रायल और जांच 2 साल के भीतर किया जाएगा जो कि बढ़कर अधिकतम 4 साल हो सकेगा।

इतना ही नहीं किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जांच करने से पहले संबंधित विभाग से या फिर सरकार से उस बाबत परमिशन ली जाएगी और ऐसा सर्विस और सेवानिवृत सरकारी कर्मचारियों के साथ समान रूप से पालन किया जाएगा। इन कर्मचारियों के खिलाफ जांच करने की परमिशन 3 से चार महीने के भीतर देना अनिवार्य माना गया है।

जाहिर है सरकार मानती है कि उसके इस कदम से सरकारी कर्मचारी सशक्त होंगे जो भय के माहौल में ईमानदारी से काम करने में डरने लगे थे और उन्हें डर था कि उन्हें भी जटिल कानूनी प्रक्रिया के शिकंजे से कभी भी गुजरना पड़ेगा भले ही उनकी नीयत और निष्ठा पूरी तरह से साफ ही क्यूं न हो। इसलिए सरकार इस कदम को पॉलिसी पैरालाइसिस से बचाने में काफी मददगार मानती है।