क्या बनारस के बुनकर ले पाएंगे चैन की सांस?

BUNKARजिला वाराणसी। वाराणसी में गंगा घाट और मंदिरों के अलावा वहां का रेशम भी दुनिया में जाना जाता है। बनारसी साडि़यों को लोग हज़्ाारों रुपए में खरीदते हैं। यहां तक कि इन साडि़यों को देश के बाहर भी भेजा जाता है। पर इन रेश्मी साडि़यों को बनाने के लिए जो बुनकर दिन रात एक करके रेशम बुनते हैं, उनकी स्थिति गम्भीर है, खासकर कि जब बात उनके स्वास्थ्य की हो।

वाराणसी के रेशम के बुनकरों में टीबी की बीमारी होने का खतरा बना रहता है। बुनकर लगातार रुई की धूल के बीच रहते हैं जो उनके फेफड़ों में चली जाती है। इससे संक्रमण होने का खतरा बन जाता है। बुनकरों का समुदाय काफी गरीब भी है। उनके घर ज़्यादातर बंद, अंधेरे, सीलन से भरे होते हैं। यही सब टी बी का कारण बनते हैं।
अभी तक तो स्वास्थ्य अधिकारीयों को इस समस्या के फैलाव की जानकारी ही नहीं थी मगर 9 मार्च से वाराणसी में इस पर सर्वेक्षण की शुरुआत की गई है। इसमें ऐसे इलाकों को लिया जाएगा जहां बुनकरों की आबादी ज़्यादा है।

वाराणसी के अलावा पास के ही भदोही और मिज़र््ाापुर जिलों में भी बुनकर समुदाय के स्वास्थ्य का ऐसा सर्वे किया जाएगा। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य है टीबी के नए मामले खोजना, लोगों का इसको लेकर नज़रिया जानना और इसके फैलाव का पता लगाना। इसमें 3 जिलों के पच्चीस हज़्ाार घरों को देखा जाएगा। इनमें पंद्रह हज़्ाार परिवार वाराणसी से हैं और पांच-पांच हज़्ाार परिवार भदोही और मिज़र््ाापुर से लिए जाएंगे।