क्या? टॉस नहीं? ये क्रिकेट नहीं है!

 

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क्रिकेट में, मैच से पहले कप्तान टॉस के लिए जाते है . इस वक़्त उनसे आशा की जाती है कि उनको पता हो, उन्हें टॉस जीतने पर क्या करना है . मगर हमेशा ऐसा हो ज़रूरी नहीं, ये बात सब कप्तानों पर खरी नहीं उतरती.

उदाहरण के लिए एक मशहूर भारत के कप्तान को टॉस जीतने से डर लगता था . ऐसा इसलिए था क्योंकि उन्हें पिच का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था . रिकी पोंटिंग को बेहतर आईडिया आया . पिछले साल के लॉर्ड्स में हुए एशेज टेस्ट में उन्होंने सुझाव दिया कि टॉस किया ही न जाए . क्या ये पहली बार था कि किसी लोकप्रिय कप्तान ने ऐसा कहा हो? ये तो पक्के तौर पर नहीं कह सकते. मगर उनके बाद कई और भी क्रिकेटरों ने ऐसा बोला. जैसे शेन वार्न, इयान बॉथम और माइकल होल्डिंग.

जब इसका सुझाव दिया गया तो ये बहुत अजीब लगा. क्या? कोई टॉस नहीं? ये क्रिकेट नहीं है! टॉस क्रिकट का इतना बड़ा हिस्सा रहा है कि उसे छोड़ देने के बारे में सोचना भी मुश्किल हो गया. क्रिकेट टेस्ट मैचों से एक दिवसीय मैच और फिर ट्वेंटी20 की ओर बढ़ गया है. सफ़ेद वर्दी की जगह रंग बिरंगे कपड़ों ने ले ली है. स्टंप्स, लगे स्क्रीन और भी कई चीज़े बदली हैं. मगर टॉस नहीं. किसी भी दूसरे खेल से क्रिकेट में टॉस ज़्यादा ज़रूरी है. इसका मतलब है, इसका असर पड़ता है. और यही कारण है कि उसे नहीं होना चाहिए.

इस समय में जब द्विदिशीय सीरीजों में और खासकर 5 दिवसीय सीरीज़ में होम साइड की ज़्यादा चलती है. टीमों और बल्ला, गेंद दोनों के बीच बेहतर प्रतियोगिता की बहुत ज़रूरत है. ऐसे में टॉस को न करना एक सरल और अच्छा उपाय लगता है. एक साइड के पास अपने देश में होने का फायदा होता है,  उसे मिटाया नहीं जा सकता. ऐसे में उस देश में खेलने आई टीम को भी कुछ फायदा मिलना चाहिए. ऐसे में टॉस जीतना या कुछ ऐसा ही हो जाए तो उससे अच्छा क्या होगा?