कम होती हिलसा मछली की वजह से गंगा खो रही है अपनी शान

hilsa 

हिलसा कभी गंगा में बंगाल की खाड़ी से दिल्ली तक पाई जाती थी।  आज गंगा इतनी गन्दी हो गई है कि वह 75 किलोमीटर से ज़्यादा नहीं तैर पाती। 

 
हाल ही में पश्चिम बंगाल में नोबो बोर्शो  (नया साल) मनाया गया।  इस मौके पर परंपरागत खाने में इलिश भाजा यानी सरसों के तेल में तली हिलसा होनी चाहिए थी।  मगर अब कोलकाता के घरों में ये अतीत की बात हो गई है।
 
बक्सी गाँव में भी, जिसे हिलसा गाँव के नाम से जाना जाता था, हिलसा इतिहास का भाग बनती जा रही है।  कोलकाता से सिर्फ 55 किलोमीटर दूर रूपनारायण नदी के तट पर इस गाँव को हिलसा गाँव की उपाधी मिली थी।  कारण – यहां के निवासी इस मछली को अपने लिए और बेचने के लिए बड़ी मात्रा में पकड़ते थे।  मगर अब ये गंगा की इस उपनदी में लगभग ख़त्म ही हो गई है।
 
“पहले बक्सी गाँव में रहने वाले 650 परिवारों में से 400 सिर्फ हिलसा को ही पकड़ने का काम करते थे। मगर अब जब उनका मिलना मुश्किल होता जा रहा है उनमे से ज़्यादातर दूसरी मछलियां पकड़ने लगे है या अपना व्यवसाय बदल लिया है। ऐसी ही कुछ कहानी हावड़ा जिले के गाँवों की भी है।”  रूपनारायण नदी मोत्सोजिबि संघ के सचिव बिमल मंडल ने बताया।   
 
आज नदी के तट पर मछली पकड़ने की नावे उल्टी पडी हैं।  पश्चिम बंगाल में हिलसा मछली का दिखाई न देना एक आम बात हो गयी है। पकड़ी जाने वाली हिलसा की संख्या 2001 – 02 में 77,912 टन से 2014 – 15 में 9,887 टन आ गयी है।  जो लगभग 90 प्रतिशत की कमी है। 2000 से 2015 के बीच पश्चिमी बंगाल के समुद्र तट पर इस मछली का पकड़ा जाना 80 प्रतिशत काम हुआ है।  राज्य के आतंरिक भागों में इसका पकड़ा जाना लगभग 97 प्रतिशत काम हो गया है।  “इन आंकड़ों से पता चलता है कि कैसे हिलसा का प्रवाह के विपरीत दिशा में जाना प्रभावित हुआ है। इसके कई कारण है जिनमे से गंगा का अवसादन और उसमे गहराई की कमी मुख्य हैं।”(किसी तरल – द्रव या गैस, में मौजूद कणों का जमीन पर आकर बैठ जाना अवसादन, सेडिमेन्टेशन या तलछटीकरण कहलाता है। ) . CIFRI के मत्स्य पालन विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष उत्पल भौमिक ने बताया।   
 
हिलसा को समुद्र से नदी में प्रवेश करने के लिए उसके मुहाने पर 40 फ़ीट की गहराई चाहिए होती है।  सालों से गंगा के मुहाने पर गहराई 30 फ़ीट से ज़्यादा नहीं है।  मानसून की अनुपस्थिति में तो ये और भी कम होती है. हिलसा गंगा के मुहाने पर जमा होती हैं।  मगर यहां उन्हें पूरी गहराई न मिलने के कारण वे बांग्लादेश, म्यांमार की तरफ बढ़ जाती हैं। भौमिक ने बताया।    
 
पानी की कमी के अलावा मछलियों के गायब होने के दो और मुख्य कारण इनको बहुत ज़्यादा पकड़ा जाना और नदी का प्रदूषण  भी है।    
 
पश्चिम बंगाल की सरकार ने हिलसा के प्रजनन के दिनों में – जो अक्टूबर में पूर्णिमा के आस पास होते हैं – हिलसा को पकड़ने पर रोक लगा दी है। गंगा के तीन हिस्सों को अभयारण्य घोषित कर दिया है यानी यहाँ मछली नहीं पकड़ी जा सकती  . ये इलाके है – डायमंड हारबर के पास गोदखली, त्रिवेणी के पास हूघलय घाट और लालबाग – फरक्का  . मगर इस मॉडल को जहां बांग्लादेश में बहुत सफलता मिली यहाँ वो पेपर पर ही है। 
 
पहले अधिक संख्या में आने पर हिलसा आगरा, कानपुर और दिल्ली तक जाती थी। और आम दिनों में इलाहबाद तक पहुंचती थी। बांग्लादेश और भारत की संयुक्त टीम की रिपोर्ट के अनुसार अब हिलसा डायमंड हार्बर तक ही सिमट कर रह गयी है।  जो नदी के मुहाने से 75 किलोमीटर दूर है।
 
बांग्लादेश की तरह ही भारत में भी नियम है कि मछली गिल नेट से न पकड़ी जाये।  इस नेट में छोटा जाल होता है जिसमे युवा छोटी मछलियां भी फस जाती है।  मगर किसी भी समय पर लगभग 8000 मछुआरे, इस 1 किलोमीटर नेट को लेकर गंगा के मुहाने पर मछली पकड़ रहे होते हैं।  ऐसे में हिलसा के पास कम ही मौका होता है नदी में आगे बढ़ने का। इसके अलावा बाँध भी इसके रस्ते की रुकावट बनते है।  
 
हिलसा अरब सागर में भी रहती है। वो यहां से नर्मदा और तापी नदियों में बढ़ती है। पश्चिम बंगाल के बहार बाकी ज़्यादातर भारत में नर्मदा नदी इस मछली का मुख्य श्रोते हो गयी है। दिल्ली और मुंबई में बेची जाने वाली ज़्यादातर हिंसा नर्मदा से ही आती है। यहाँ रहने वाले बंगाल के लोग इसे खुशी से खरीबते हैं।  हालाँकि उनका कहना है कि गंगा की हिलसा ज़्यादा मज़ेदार होती है।  
 
मेघना बेसिन और गंगा से परे अगर कोई हिलसा है जिसकी याद आज भी ताज़ा है तो वो है कराची हिलसा। भारत के बटवारे के बाद से भारतीय इसे नहीं खा पाए हैं।  मगर जिन्होंने इसे खाया है वे इसका मज़ा नहीं भूल पाए है, भले ही इसका नाम भूल गए हों।
साभार: जयंता बासु, द वायर (http://thewire.in/2016/04/18/with-hilsa-fish-declining-ganga-losing-its-silver-sheen-30142/)