कमियों का भंडार बनी ‘खाद्य सुरक्षा योजना’

भाखर 100-50 रुपए जमा कर कईयों बार आवेदन कंर चुके हैं। लेकिन उनका राशन कार्ड आज तक नहीं बना
भाखर 100-50 रुपए जमा कर कईयों बार आवेदन कंर चुके हैं। लेकिन उनका राशन कार्ड आज तक नहीं बना

बांदा जिला, गांव कटरा कालिंजर। 1 जनवरी को यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना’ उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त जिलों में लागू करने की घोषणा की। इस योजना के तहत 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को खाद्यान्न मूल्यों पर, अन्त्योदय और बीपीएल राशन कार्ड के द्वारा तीन रुपये में गेंहूं और दो रुपये में चावल दिया जाएगा।
1 मार्च से खाद्य सुरक्षा अधिनियम यूपी के सारे जिलों में लागू हो गया। सरकार इस योजना को उत्तर प्रदेश के 53 करोड़ लोगों तक पहुंचाना चाहती है।
जनवरी में खबर लहरिया ने बांदा जिले में जाकर इस योजना जायजा लिया। योजना के शुरुआती दौरे में ही कई सारी कमियां सामने आने लगीं। सैंकड़ो परिवारों का ऑनलाइन पंजीकरण हुआ लेकिन राशन कार्ड में उनके परिवार के सदस्यों की संख्या कम हो गयी। यानि, परिवार में आठ लोग होने के बाद भी राशन कार्ड में एक ही सदस्य को दिखाया गया। जिसके कारण आठ सदस्यों वाले परिवार में, एक ही सदस्य के हिसाब से राशन दिया गया।
तीन महीने बाद खबर लहरिया ने बांदा जिले के नरैनी ब्लॉक में योजना का पुनरवलोकन किया। जिस तरह की कमियां पहले देखी गई, वैसी ही समस्याएं और दिक्कते इस बार भी सामने आई। इस बार सबसे बड़ी समस्या, खाद्य सुरक्षा योजना का राशन ‘पहले आओ,पहले पाओ’ की तर्ज पर दिया गया।
khady surakshaयहां यह योजना अपने मुख्य उद्देश्य यानि ‘ग्रामीण लाभार्थी को सुरक्षा कवच के अन्दर लेकर आने की पहल’ से हटती नजर आ रही है।
अप्रैल माह में एक बार फिर खबर लहरिया ने सरकार की इस खाद्य योजना के सत्य को जानने की कोशिश की है। इस बार हम बाँदा जिला, कटरा कालिंजर में खाद्य सुरक्षा योजना पर नजर रखे हुए हैं।
कटरा कालिंजर वह गांव है जिसे सांसद भैरों प्रसाद ने गोद ले रखा है। इस गांव में रहने वाले भाखर के घर में खाने के लिए सिवाए आलू के कुछ नहीं है। उनका राशन कार्ड आज तक नहीं बना, जबकि भाखर 100-50 रुपए जमा कर कईयों बार आवेदन कर चुके हैं। उनकी पत्नी 8-9 सालों से आस-पास के परिवारों से भोजन मांग कर अपने परिवार का पेट भरती आ रहीं हैं।
गांव के अन्य लोगों से पूछताछ करने पर पता लगा कि पहले से जिन परिवारों के पास पीला या लाल कार्ड था, उनका ऑनलाइन पंजीकरण के बाद, कार्ड बदल कर सफेद कर दिया गया है।
यही नहीं, सरकार द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण के लिए मात्र 20 रुपए फीस रखी गई है लेकिन पाटेदार ऑनलाइन पंजीकरण करने के लिए गांव वालों से 100 से 150 रुपए तक वसूल रहा है। हालात यह हैं कि जिन परिवारों के पास पैसे नहीं हैं वह राशन कार्ड के बारे में सोच भी नहीं सकते और आस-पास से भोजन मांग कर खाने पर मजबूर हैं।
यह सरकार की योजनाओं का कटु सत्य है जो गांव वालों को भूखा मरने पर विवश कर रहा है। इस पूरी योजना की जानकारी न किसी गांव वाले को है और न ही किसी ठेकेदार या पाटेदार को।
इस योजना की सच्चाई यही है कि जो जिस तरह से शोषण कर सकता है, कर रहा है।

रिपोर्टर: मीरा देवी