औरतन खातिर कानून तौ है, पै जिम्मेदारी नहीं

kanoonकारवाही के नाम मा खानापूर्ति करैं से औरतन अउर लड़कियन के साथै होय वाली यौनिक हिंसा, छेड़खानी अउर बलात्कार के मामला बढ़त जात हैं। खैर या बात का नकारा नहीं जा सकत आय कि पुलिस सोच समझ के साथै कउनौ भी मामला मा कारवाही करत है। अब सवाल या उठत है कि या कउनतान के सोची समझी कारवाही आय जेहिमा पुलिस का यौनिक हिंसा जइसे के मामला मा चोरी, गाली गलौज अउर मारपीट के धारा लगावैं का परै। या फेर समझउता करा के मामला रफा दफा कीन जाय?

एक कइत कानून कहत है कि यौनिक हिंसा, छेड़खानी अउर बलात्कार के मामलन मा रपट लिख के कारवाही करैं खातिर औरतन के बयान ही काफी हैं। 2012 मा दिल्ली मा भा सामूहिक बलात्कार के मामला के बाद औरतन मा होत हिंसा के खिलाफ जस्टिस वर्मा कमेटी एक नवा कानून बनाइस रहै। यहिके तहत जबै कउनौ औरत यौन उत्पीडन का मामला लिखावत है तौ वा केस के छानबीन अउर कारवाही का पुलिस प्राथमिकता देई। पर बांदा जिला मा कुछ अउर ही स्थिति है। हेंया औरतन का सही अपराधिक धारा के तहत रपट लिखावैं मा ही यतनी समस्या होत हैं।

इं मामलन मा पुलिस आपन जवाबदेही मा एक ही बात कहत है कि अबै जांच चलत है। जांच चलैं के कउनौ समय सीमा भी होत है? कतौ-कतौ या समय सीमा यतनी बढ़ जात है कि जांच खतम होय के इंतजार मा मड़इन के जिंदगी खतम होई जात है पै जांच चलतै रहत है। इनतान के गोलमोल जवाब से एक ही बात समझ मा आवत है कि पुलिस कउनौ भी मामला का लइके जिम्मेदार नहीं देखात आय। यहै कारन है कि औरतन का, नियाव के आसरा मा एस.पी. अउर डी.आई.जी. तक आवैं का परत है।