इ हाल हव अस्पताल के

जिला वाराणसी।  सरकार अस्पताल बनवइले हव कि जनता बीमारी से दूर रहे। अस्पताल में समय से पहुचें खातिर सरकार के तरफ से एम्बुलेंस के सुविधा मिल हव। अस्पताल तो मरीज पहुंच जात हयन लेकिन ओकरे बाद मरीज लावारिष के तरह फेंका जात हयन। इ त हाल हव बनारस के सरकारी अस्पताल के।
बनारस के कबीर चैरा के वाह्य कक्ष में एक मेहरारू समय से अस्पताल आ गइल रहील लेकिन ओकर इलाज ना होवे से उ मेहरारू तड़प के मर गइल। लेकिन ओकर इलाज भी नाहीं भयल। सरकार एही खातिर के सुविधा निकलले हव कि मरीज आवे आउर तड़प् के मर जाए। सरकार के सुविधा के का फायदा होत हव। गावं गावं में भी उपकेन्द्र बनल हव लेकिन कहीं के उपकेन्द्र में भूषा भरल हव त कहीं के उपकेन्द्र में गोहरी भरल हव। आखिर इलाज कइसे होई? गावं वालन त दवाई खातिर के तड़प तड़प् के मर जात हयन। अगर कहीं इलाज हो भी जात हव त वहां के दवाई एतना मंहगा लिखा जाला कि जनता ले नाहीं पावत।आखिर कब तक अहिसहीं होल करी। कब गावं के गरीब जनता के ठीक से दवाई मिले शुरू होई। कब अहिसन दिन आई कि गावं के जनता के सरकारी अस्पताल में से ठीक से दवाई मिले शुरू हो जाई?