आस लगउले बइठल हई

जिला वाराणसी, ब्लाक चोलापुर, गावं डुबकियं। इहां के सुनरा देवी के कहब हव कि हमार उमर धीरे धीरे अस्सी बरस होत हव। लेकिन अभहीं तक हमके कउनों पेंशन नाहीं मिलल। जबकि हमके विधवा भइले भी तेरह साल होत हव।
इनकर कहब हव कि हमके विधवा भइले तेरह बरिश हो जाला। हमार उमर ढेर हव। फिर भी हमके वृद्धा पेंशन नाहीरं मिलत हव। अब लइकन पर कइसे भरोसा करल जाई। लइकन अपने परिवार में जूझत रहलन। अब हमके पैरूख भी नाहीं हव कि काम करके आपन खर्चा चला लेब। एही सोचीला कि जब हमके पेंशन तिमले लगत त हमके कुछ सहारा होत जात। अब आदमी भी नाहीं हयन कि कमहीयन त खर्चा चली। अगर पेंशन मिलत त हमरे दर दवाई, धोती, कपड़ा साबुन तेल के काम चलत। अगर इहो त एक खर्चा हव न। लइका त बहुत करीयन खाना खिया देहियन। आउर त खर्चा चाही। जब प्रधान से कहब त प्रधान कभ्भो सुनब नाहीं करलन।
विकास समाज कल्याण सहायक प्रभुनाथ यादव के कहब हव कि वृद्धा पेंशन में 2002 के सूची में जेकर नाम रही आउर वाषिक आय 19884 रूपया से कम रही। लघु सीमान्त कृषि भूमि के मामले में कोई भरण पोषण ना करत होई। उमर साठ वर्ष से उपर होई। Mahila mudda