आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, सच का सामना जरूरी

800px-Candlelight_Rally_Against_Rape_-_Sector-V_-_Salt_Lake_City_-_Kolkata_2012-12-29_2108भारत में दिसंबर 2012 में हुए बलात्कार पर बनी फिल्म के जवाब में एक दूसरी फिल्म बन गई है। यूनाईटेड किंगडम्स डाटर्स नाम से बनी दूसरी फिल्म में बताया गया है कि अमेरिका बलात्कार के मामले में भारत से बहुत आगे है। जो लोग पहली फिल्म को भारत की छवि खराब करने वाला कह रहे थे वह लोग अब इस दूसरी फिल्म को आधार बनाकर कह रहे हैं कि देखा भारत उतना भी बुरा नहीं है जितना फिल्म में दिखाया गया है। तो क्या इसे आधार बनाकर हमें तसल्ली करनी चाहिए?
हाल ही में हुए कुछ बलात्कार मीडिया की सुर्खियों में आए। हालांकि बहुत से मामले अक्सर खबर बनकर खत्म हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामले चर्चा का मुद्दा बनते हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में नदिया जिले में बहत्तर साल की ईसाई नन के साथ हुआ बलात्कार। उसके कुछ दिनों के बाद वर्धमान जिले में एक सत्तर साल की औरत के साथ बलात्कार हुआ। एक खबर जो खूब चर्चा में रही वह थी चालीस साल की सुजैट जोर्डन नाम की महिला की मौत। फरवरी 2012 में उसके साथ भी बलात्कार हुआ था। वह पहली महिला थी जिसने पंद्रह महीनों बाद मीडिया से कहा था कि मैं अपनी पहचान नहीं छिपाना चाहती हूं।
जब भी बलात्कार होते हैं तो अजीबो गरीब बयान आते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने सुजैट के बलात्कार के बाद कहा था कि इस मामले को बढ़ाचढ़ाकर पेश करके राज्य की छवि खराब करने की साजिश हो रही है। क्या ऐसी घटनाओं और बयानों के बाद भी हमें मानसिकता पर विचार करने और सवाल उठाने की बजाए खुद को साफ साबित करने के लिए आंकड़ों को खोजना चाहिए? या सच का सामना कर कुछ करना चाहिए?