अव्यवस्था का केंद्र है डिलेवरी प्वाइंट

सरकार भले ही सुरक्षित एवं संस्थागत प्रसव के लिए सुविधाएं देने के दावे करे लेकिन डिलेवरी केंद्रों में फैली अव्यवस्था इनकी पोल खोलती है।

नहीं मिलता भरपेट खाना

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कागजी मीनू और जमीनी खाने में है बड़ा अंतर

जिला चित्रकूट। डिलेवरी केंद्रों में भर्ती महिलाओं को नियमानुसार डिलेवरी के बाद 48 घंटे तक रोकना ज़रूरी होता है। इस बीच उनकी दवाई और खाने की ज़िम्मेदारी केंद्र की है। लेकिन जब मऊ ब्लाक के सामुदायिक केंद्र में खबर लहरिया के पत्रकारों ने सुबह से दोपहर तक का समय गुज़ारा तो कुछ और ही नज़र आया। बम्बुरी गांव की सुमन और सिकरौ गांव की अनीता इस केंद्र में भर्ती थीं। दोनों को खाने के लिए दोपहर तक इंतज़ार करना पड़ा। नाश्ता मिला नहीं और दोपहर के खाने में उन्हें केवल चार पूड़ी और सब्ज़ी मिली।
मीनू में क्या
महिला को तीनों वक्त खाना देने का नियम है। नाश्ते में अंडा, दूध, चाय और ब्रेड। खाने में दाल, चावल दो सब्जी छह रोटी और फल मिलने चाहिए।

बेड नहीं तो ज़मीन में डिलेवरी
जिला महोबा। कबरई सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र में केवल छह बेड हैं। अगर ज़्यादा डिलेवरी के केस आ जाते हैं तो ज़मीन पर लिटाकर डिलेवरी होती है। कबरई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डा. जी.आर. रतमेले ने बताया कि ऐसी व्यवस्था में यहां एक महीने में 131 डिलेवरी हुई हैं। यहां सर्जन, अल्ट्रासाउन्ड मशीन और वार्ड बाय की कमी है।

दिखावटी उपकरण

जिला बांदा। यहां के जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीन सालों से खराब है। नाम के लिए बने ब्लड बैंक से आज तक किसी मरीज़ को ब्लड नहीं मिल पाया है। यहां के मातृ शिशु एवं परिवार कल्याण उपकेंद्र चिल्ला में आक्सीजन सिलेंडर, सक्शन पंप, इनक्यूबेटर जैसी सारी आधुनिक मशीनें मौजूद हैं। यहां की ए.एन.एम.
ने बताया कि सभी मशीनें खराब पड़ी हैं।

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बिना इस्तेमाल ही खराब हुआ सक्शन पंप