अरुणा को न्याय दिलाने में नाकाम न्याय व्यवस्था

यौन हिंसा और हत्या के प्रयास का सामना करने वाली अरुणा शानबाग की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला और चुभने वाला सवाल है कि अरुणा यौन हिंसा का शिकार हुई थीं, उनके साथ गुदा द्वार के रास्ते बलात्कार किया गया । यह बात उनकी मेडिकल रिपोर्ट से सामने आई। मगर अस्पताल प्रशासन ने इसे रिपोर्ट से हटा दिया। इसके पीछे कारण दिया गया कि अरुणा जब ठीक हो जाएंगी तो उनकी वैवाहिक जिंदगी में इसका असर पड़ेगा। दूसरा कारण जो नहीं दिया गया मगर कहीं न कहीं वह बड़ा कारण था। वह था अस्पताल की प्रतिष्ठा का सवाल।
अरुणा कभी ठीक नहीं हुईं। बयालिस साल तक वह कोमा में रहीं और इसी स्थिति में वह मर गईं। अरुणा की मौत ने एक बार फिर उस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए जो समाज में स्थापित है। औरतों के साथ होने वाली यौन हिंसा को छिपाकर रखना। दोषी को सजा दिलाने की बजाए यौन हिंसा की शिकार औरतों को अपने साथ हुए इस हादसे पर चुप्पी साधने की सलाह देना। अरुणा तो कोमा में चली गईं थीं इसलिए वो तो कुछ कह ही नहीं सकती थीं। लेकिन अस्पताल प्रशासन ने वही किया जो घर के लोग या समाज के लोग करते हैं। दोषी पर हत्या के प्रयास और लूटपाट का ही आरोप तय हुआ। सात साल की सजा काटकर वह छूट गया। मगर अरुणा आजीवन मौत से जूझती रहीं। उन्हें अपने साथ हुए अपराध की सजा के लिए पूरी जिंदगी एक कमरे के भीतर एक बिस्तर में काटनी पड़ी।
अरुणा के साथ हुए इस अन्याय को देखकर लगता है कि कोमा में अरुणा नहीं बल्कि हमारी न्याय व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था है।