अच्छे दिनों का अधूरा रह गया वादा

Desh Videsh - Narendara Modiनई दिल्ली। केंद्र सरकार को 26 मई को एक साल हो गया। अच्छे दिन के वादे के साथ आई सरकार के ज़्यादातर वादे अधूरे ही हैं।
एक नज़र रिपोर्ट कार्ड पर
भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने का सबसे सकारात्मक असर वैश्विक बाज़ार पर पड़ा। शेयर मार्केट लगातार मुनाफे में है। लेकिन भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सरकार की खूब आलोचना हुई। इसे लोग किसान विरोधी साबित कर रहे हैं मगर सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि यह किसानों के हित में है। काले धन को वापस लाने के वादे के साथ आई मोदी सरकार को इसमें भी सफलता नहीं मिली। कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमज़ोर हुई है। किसानों से किए वादे पूरे नहीं हुए। खेती से जुड़े उपकरणों, खाद, बीज में मिलने वाली छूट देने के मामले में भी कुछ खास नहीं कर पाई। 2009-2010 के मुकाबले सरकार की तरफ से मिलने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य की रकम घटी है। ग्रामीण इलाकों में मिलने वाली औसत दिहाड़ी जहां 2009 में साढ़े चार प्रतिशत थी वहीं 2015 में एक प्रतिशत से भी कम रह गई।

इपसस नाम की सर्वे संस्था ने मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, बेंग्लुरु, पुणे, हैदराबाद, दिल्ली में तेरह सौ लोगों से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के बारे में सवाल पूछे।
सवाल-आप लोगों को लगता है कि हमने नरेंद्र मोदी से जो उम्मीदें की थीं वह बहुत ज़्यादा थीं। मोदी उन्हें पूरा नहीं कर पाए?
जवाब-सत्तावन प्रतिशत लोगों ने कहा हां, मोदी के वादे हवाई थे। पैंतिस प्रतिशत लोगों ने कहा नहीं उम्मीद बाकी है। बाकी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।
सवाल-केंद्र सरकार की कौन सी योजना आपको अच्छी लगी?
जवाब-स्वच्छ भारत अभियान को अड़तालिस प्रतिशत ने पसंद किया। जन धन योजना को पंद्रह प्रतिशत ने, बाईस प्रतिशत ने दूसरी योजनाओं केा पसंद किया।
सवाल- सबसे बड़ी गलती सरकार की क्या रही?
जवाब- बत्तीस प्रतिशत ने कहा मंत्रियों के बेलगाम बयानों पर लगाम न लगा पाना। पच्चीस प्रतिशत ने कहा भूमि अधिग्रहण विधेयक को लाना। बाईस प्रतिशत ने कहा प्रधानमंत्री का नाम लिखा महंगा सूट।