99.38 फीसदी भारतीयों पर लागू है गौ संरक्षण कानून

31 मार्च, 2017 को गुजरात राज्य विधानसभा ने राज्य में गाय संरक्षण कानूनों में संशोधन किया है। नए कानून के तहत गौ हत्या की सजा सात साल के करावास से बढ़ा कर आजीवन कारावास और 5 लाख रुपए तक जुर्माने में बदल दिया गया है। यह संशोधन 1954 के गुजरात पशु संरक्षण कानून के तहत किए गए हैं, जिसके अनुसार गौ हत्या या हत्या के लिया गायों को एक जगह से दूसरे जगह ले जाना और गौमांस रखना गैर जमानती अपराध है।

इन संशोधनों के बाद गायों और बैलों जैसे पशुधन की रक्षा के लिए देश के सख्त कानूनों के साथ गुजरात गौ संरक्षण के मामले में सबसे ऊपर है।

देश भर में गाय संरक्षण कानूनों के विश्लेषण में पाया गया

मार्च 2017 तक भारत के 84 फीसदी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटीएस) में गौ हत्या पर प्रतिबंध लग गया गया है। इन इलाकों में देश की लगभग 99.38 फीसदी आबादी रहती है।

 

गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाए गए लगभग आधे राज्यों में कानून करीब 50 वर्ष पुराने हैं, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान अधिनियमित हुए हैं। जम्मू-कश्मीर और मणिपुर दो ऐसे राज्य हैं जहां गौ हत्या पर प्रतिबंध काफी पहले से है। दोनों राज्यों में भारत की आजादी से पहले 1932 और 1936 में तात्कालीन शासकों ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया था।

-1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद, 80 फीसदी से अधिक राज्यों में गौ हत्या पर प्रतिबंध का भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तहत हुआ है। पिछले 23 सालों में 11 में से 10 राज्यों में विशेष रुप से लागू किए गए गाय संरक्षण कानून अधिक सख्त हैं।

-गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाए गए 77 फीसदी या 24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में, यह अपराध संज्ञेय है और इनमें से आधे से अधिक (13) राज्यों में यह गैर जमानती है। भारत के आपराधिक प्रक्रिया कोड के तहत, संज्ञेय अपराध गंभीर अपराध माने जाते हैं। जैसे कि हत्या, बलात्कार, दहेज से जुड़ी मौतें और अपहरण। ऐसे मामलों में पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है और मैजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना भी जांच शुरू की जा सकती है।

भारतीय राजनीति में गाय संरक्षण का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता के पूर्व आर्य समाज जैसे बड़े संगठनों से इसे भारी समर्थन प्राप्त हुआ था।

गुजरात में हालिया संशोधन से पहले जम्मू-कश्मीर जैसे मुस्लिम-प्रभुत्व वाले राज्य में गौ हत्या के खिलाफ सबसे सख्त कानून मौजूद था। कानून के तहत गौ हत्या एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। कानून तोड़ने के जुर्म में 10 साल तक की जेल और पशु की कीमत से पांच गुना तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।

इस अपराध की गंभीरता के मामले में हरियाणा तीसरे स्थान पर है। झारखंड में गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम 2005 में 10 साल की सजा और 10 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। उत्तराखंड में भी गौ हत्या पर 10 वर्ष की कारावास की अधिकतम सजा तय है।

इसके विपरीत, केरल और सिक्किम में गौ हत्या पर प्रतिबंध सबसे नरम है। केरल में केरल पंचायत (वध घर और मांस स्टालों) नियम, 1964 और शहरी इलाकों में 1976 के सरकारी आदेश के अनुसार ग्रामीण इलाकों में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया गया है, लेकिन यदि पशु  की आयु 10 वर्ष है तो इसकी अनुमति दी जाती है। अपराधियों पर 1,000 रुपए का जुर्माना है। इसी तरह 2008 सिक्किम पुलिस अधिनियम केवल सार्वजनिक स्थानों पर ही गाय हत्या पर प्रतिबंध की अनुमति देता है। यहां केवल विनाशकारी वध के लिए मौद्रिक दंड का प्रावधान है।

सेंट्रल डिपार्टमेंट ऑफ एनिमल हज्बन्ड्री, डेरीइंग एंड फिशरीज’ (डीएएचडी) के इस दस्तावेज के अनुसार चार राज्यों -अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड और लक्षद्वीप के संघ शासित क्षेत्र में गौ हत्या से संबंधित कानून नहीं है।

जबकि अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, दादर एवं नगर हवेली और त्रिपुरा में गाय वध पर प्रतिबंध लगाया गया है, जैसा कि डीएएचडी दस्तावेज में बताया गया है। हालांकि वहां इस कानून के बारे में सार्वजनिक रूप से सीमित जानकारी उपलब्ध है।

फोटो और लेख साभार:इंडियास्पेंड