तीन महीनों में दो फांसियां

नई दिल्ली। संसद पर हमले की योजना बनाने के इल्ज़ाम में अफजल गुरु को 9 फरवरी 2013 और मुंबई आतंकवाद हमले में पकड़े गए अजमल कसाब को 21 नवम्बर 2012 को फांसी लगा दी गई। चंदन की तस्करी करने वाले वीरप्पन के चार साथियों की सज़ा माफ करने की मांग को देष के राष्ट्रपति ने हाल ही में रद्द कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर 20 फरवरी को इन चारों की फांसी पर फिल्हाल रोक लगा दी है।
अफज़ल गुरु                        अजमल कसाब
अफजल गुरु को 13 दिसम्बर 2001 को दिल्ली के संसद भवन पर हमला का मुख्य आरोपी माना गया था जबकि अजमल कसाब साल 2008 में मुंबई में हुए हमलों में पकड़ा गया था। देष में पिछले तीन महीनों में ही इन दोनों को फंसियां दी गईं। कसाब को दी गई फांसी को लेकर सरकार पर कई सवाल खड़े किये गए। इससे पहले कलकत्ता के धनंजय चैटर्जी को 2004 में 14 साल की लड़की के बलात्कार और हत्या के मामले में फांसी हुई थी। उधर फरवरी 2013 में अफजल गुरू की फांसी से जम्मू कश्मीर राज्य में सरकार को नाकाबंदी करनी पड़ी।
अब वीरप्पन के चार साथियों के लिये भी फांसी की कार्यवाही चल रही है। ऐसे में कांग्रेस की यू.पी.ए. सरकार पर कई सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि साल 2014 में होने वाले चुनाव की वजह से सरकार हड़बड़ी में है। सरकार इन फैसलों के जरिये अपनी नरम छवि को बदलना चाहती है क्यूंकि सरकार पर लगातार सख्त फैसले न लेने के आरोप लग रहे थे। हालांकि अभी पूरे देश में अलग अलग जेलों में 176 लोग पर फांसी को लेकर फैसला होना है। मानवाधिकार के मुद्दों पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ऐम्नेस्टी ने भारत सरकार के इन फैसलों का विरोध किया है।

कैसे होता है फांसी का फैसला?
जिन केसों में फांसी की सज़ा सुनाई गई है, उन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय कागज़ी कार्यवाही करता है। फिर मंत्रिमंडल की सलाह पर इसे राष्ट्रपति की राय के लिये भेजा जाता है। एक बार राष्ट्रपति मंजूरी दे दें तो फांसी लगाई जा सकती है।
इस समय सुशील कुमार  शिंडे गृह मंत्री और प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति हैं