43 सालों के बाद ब्रिटन देश यूरोपी यूनियन से हुआ बाहर

 

 

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23 जून को एक जनमत संग्रह के माध्यम से इंग्लैंड ने यूरोपीय संघ (ई.यू.) को छोड़ने का फैसला ले लिया है। इंग्लैंड पिछले 43 सालों से ई.यू. का सदस्य था। ई.यू. एक राजनैतिक-आर्थिक संघ है जिसमें इंग्लैंड के छोड़ने से पहले यूरोप के 28 देश सदस्य थे। इंग्लैंड में वेल्स, स्काॅटलैंड अ©र उत्तरी आयरलैंड में यह ऐतिहासिक मतदान हुआ।
इस फैसले से पहले इंग्लैंड के दो समूहों ने सक्रीय चुनाव प्रसार किया था- एक समूह ई.यू. में रहना चाहता था और दूसरा उसे छोड़ना चाहता था। इंग्लैंड के जो नागरिक ई.यू. छोड़ना चाहते थे, उन्हें उन लोगों से विवाद था जो इंग्लैंड में दूसरे देशों से पढ़ाई या नौकरी के लिए आते थे। उनके हिसाब से ऐसे लोग जब इंग्लैंड में एक अच्छी जिन्दगी की खोज में आते हैं, तो इंग्लैंड के नागरिकों की शिक्षा और नौकरियों पर बुरा असर पड़ता है।
ताज्जुब की बात तो ये है कि, जिन लोगों को ई.यू. छोड़ना था, उनमें से अधिकतर लोग इंग्लैंड के उन राज्यों में रहते हैं, जहाँ दूसरे देशों से कम लोग आये हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग ई.यू. छोड़ना चाहते हैं, उनमें अन्य देशों के लोगों के खिलाफ नस्लवादी भावनाएँ हैं।
इंग्लैंड के ज्यादातर युवा ई.यू. नहीं छोड़ना चाहते थे। इस निर्णय के बाद उन्हें ये महसूस हो रहा है कि उनके देश के विकास और भविष्य में उनका कोई हक नहीं है।
इंग्लैंड के प्रधानमंत्री, डेविड कैमराॅन, ने इस फैसले के बाद प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। वो इंग्लैंड को ई.यू. में रखना चाहते थे। उनकी जगह, लन्दन शहर के पूर्व मेयर बोरिस जॉनसन लेंगे। जॉनसन विरोधी समूह में थे जो ई.यू. को छोड़ने के पक्ष में थे।
इंग्लैंड के ई.यू. छोड़ने पर सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। इंग्लैंड की मुद्रा पाउंड पिछले 30 सालों में सबसे नीचे गिर गयी है।