2019 का चुनावी बजट

साभार: मैक्स पिक्सेल
फरवरी की शुरुआत हमारे गांवों और किसानों के लिए कई घोषणाओं को साथ आई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट के पिटारे से सबसे ज्यादा खुश करने की कोशिश जिन्हें की है, वे गांव और किसान हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भाषा में बजट भाषण देने वाले वित्त मंत्री जी जानते थे कि आज वह जिन्होंने खुश कर रहे हैं, उनकी भाषा हिन्दी है। खैर! भाषा कुछ भी हो पर क्या सच में ये आम बजट किसानों और गांवों को तरक्की की राह पर ला पायेगे ये तो कल ही बताएगा, लेकिन हम बजट की बातों के साथ जमीन सचाई को समझने की कोशिश करेंगे।
बजट और किसान
किसानों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ का पूरा लाभ देने के मकसद से डेढ़ गुना कर दिया है। साथ ही कृषि बाजार और संरचना कोष के लिए 2000 करोड़ रुपये रखे हैं। लेकिन सरकारी मण्डियों में फसल बेचना भी लड़ाई लड़ने से कम नहीं है। महोबा जिले के पचपहरा मंडी उड़द खरीद केन्द्र नहीं खुलने से परेशान किसानों ने 8 जनवरी को सड़क पर जाम लगाया। वहीं बांदा जिले के करबई गांव में टयूबवेल नम्बर-245 खराब होने से पूरे गांव के किसानों का सिंचाई काम रुका हुआ है। 5 जनवरी को शिकायत नलकूप विभाग में करने के बाद भी आज तक कोई सुधार नहीं हुआ। इस स्थिति से परेशान होकर करबई गांव के किसान ने आत्मदाह करने की धमकी दे दी।  चित्रकूट जिले के बरगढ़ गल्ला मंडी में 57 गांव के किसान अपना धान बेचने के लिए इंतजार कर रहे थे। धूप, बारिश के बीच खुले में रखी ये फसल बोरियां का इंतजार कर रहा है। 1 दिसम्बर 2017 से आए इन किसानों को 15 दिनों तक बोरियां नहीं मिली।
रोजगार और बजट
बांदा के आलोक दीनदयाल जो खुद कौशल विकास योजना के केंद्र प्रबंधक है, बजट आने से पहले कहते हैं कि लोग रोजगार चाहते हैं, जिससे लोगों की आमदनी बढ़े। साथ ही ग्रामीण युवाओं को गांवों में ही रोजगार उपलब्ध हो। वहीं छोटे कामकाजों में लगे छोटे व्यापारियों को जीएसटी को बिना पूरी तैयार से लागू करने का दुष्परिणाम अभी तक उनके कामों पर दिख रहा है। बांदा के राहुल कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि सरकार ने बहुत परेशान किया है, जीएसटी लगा दी, जिससे छोटे व्यापारी धंधा नहीं कर पा रहे हैं। नोटबंदी के तुगलकी फरमान ने किसानों को बहुत परेशान किया। बांदा के किसान रमाकांत उस समय हमें बताते हैं कि खेत नई फसल का इंतजार कर रहे हैं और हम बैंकों के सामने इंतजार कर रहे हैं। उत्तरप्रदेश में नई सरकार ने आते ही बूचड़खानों पर सरकारी लाइसेंस की बात कहकर इस उद्योगों में लगे लोगों का काम बूरी तरह से प्रभावित कर दिया था। महोबा के बूचड़खाना कारोबारी मोहम्मद शहजाद इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि सरकार हमें भूखा मारना चाहती है। वहीं महोबा की बंटी कहती हैं कि सरकारी लाइसेंस होने के बाद भी हमें इस काम को करने के लिए सुरक्षा दी जाए।
हालांकि ऊपर दी सारे बातें सरकारी नीतियों के कारण हुई हैं। बजट 2018 में वित्त मंत्री जी ने इस साल देश में 70 लाख नई नौकरियां पैदा करने की बात बजट में कही है, जिसके तहत सरकार नेशनल ट्रेनिंग कार्यक्रम के तहत छात्रवृति देगी। उच्च शिक्षा के लिए बीटेक छात्रों को पीएम रिसर्च फेला योजना शुरु करेगी। देश में 24 नये सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे। खुद का व्यापार शुरु करने वालों के लिए मुद्रा योजना के तहत 3 लाख करोड़ का धन वहीं छोटे उद्योगों के लिए 3794 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस बजट में रोजगार पर जितना ध्यान दिया गया,
उतना ध्यान पिछले तीन बजट में भी दिया जाता तो देश में रोजगार पैदा होने के साथ पहले से रोजगारों में लगे लोगों को परेशानियां नहीं उठानी पड़ती।
साभार: पिक्साबे
बजट और महिलाएं
उज्ज्वला योजना के तहत आठ करोड़ गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की बात कही गई। वहीं देश में हर साल 1 करोड़ रोजगार पैदा करने वाली ये सरकार अपने आखिरी पूरे बजट में 70 लाख नई नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य बजट में बता चुकी है। महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए स्वरोजगार करने वाली महिलाओं को मुद्रा योजना के तहत 76 प्रतिशत कर्ज देने की बात कही गई है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत बजट में 2019 तक 2 करोड़ शौचालय निर्माण की बात कही गई है। पर जमीन हकीकत देखें, तो वे सरकारी आंकडों से बहुत अलग है। आपको बता दें कि घर में शौचालय होना स्वास्थ्य के नजरे से भी ज्यादा महिला सम्मान के लिए जरुरी है। 3 अक्टूबर 2017 को महोबा में 8 साल की लड़की के साथ बलात्कार की घटना हुई। लड़की के साथ ये घटना तब हुई जब वह शौचालय में थी। ऐसी ही घटना 2017 जुलाई में हुई जब चित्रकूट की एक महिला के साथ खुले में शौचालय पर जाने के दौरान बलात्कार की घटना हुई। ये कुछ उदाहरण थी, घर में शौचालय नहीं होने के कारण खुले में शौच जाने वाली महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओं का। अगर घरों में शौचालय होता तो शायद ये घटनाएं नहीं होती।
बजट को समझने में कुछ दिन लगेंगे और लागू होने में…? खैर 2019 अब दूर नहीं इसलिए ही बजट में योजनाओं की समयसीमा 2022 तक रख दी। पिछले 3 बजटों में किसानों को किनारे रखने वाली सरकार चुनावी बिगुल के बजते ही इस बजट में किसानों को हीरो बना चुकी है।
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– अल्का मनराल