2017 किसानों, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए रहा बुरा

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बम्पर फसल होने के बावजूद भी फसल की कम कीमत, वायु प्रदूषण की बिगड़ती स्थिति और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी ढांचे के साथ जनशक्ति की कमी के कारण बच्चों की मौत की घटनाओं ने इन तीनों क्षेत्रों में साल 2017 को  बुरा साबित कर दिया है।
वित्त मंत्रालय के अनुसार 2016-17 में कृषि क्षेत्र में वृद्धि 4.9 थी, जोकि 2015-16 में 0.7 थी। अनाज का उत्पादन 2009-10 में 218.1 मिलियन टन था, जो 2016-17 में बढ़कर 275.6 मिलियन टन हो गया है। वहीं दालों में भी 2009-10 की तुलना में 2016-17 में 56.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन ये वृद्धि किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गई, क्योंकि देश में दालों का आयात 63 प्रतिशत तक कम हो चुका है। आज भी देश में 52 प्रतिशत किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं। महाराष्ट्र में 2014 और 2015 में सूखे की भरवाई तो 2016 में हो गई, लेकिन कई राज्यों को वहीं बाढ़ का सामना करना पड़ा।
नोटबंदी के कारण भी मुद्रा संकट का सामना किसानों को करना पड़ा। किसानों को नकदी की सबसे ज्यादा जरुरत के समय इससे वंचित कर दिया गया था।
2017 में दिल्ली सहित उत्तर भारत के शहरों में वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर खतरे की घण्टी है। वायु प्रदूषण से हार्ट अटैक, स्टॉक, फेफड़ों का कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इस प्रदूषण का सबसे ज्यादा बढ़ा स्तर वाराणसी में देखा गया, उसके बाद दिल्ली सहित नोयडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, कानपुर, लखनऊ में देखा गया। 2017 में बाढ़ा और प्रदूषण के कारण 600 मौतें देश में हुई।

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2017 में बाल मृत्यु बढ़ी हैं। अगस्त 2017 में गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में 70 शिशुओं की मृत्यु का मामला सामने आया। वहीं 55 शिशु मृत्यु नासिक के सिविल अस्पताल में और 49 शिशु मृत्यु फर्रुखाबाद जिला अस्पताल में हुई। जबकि राजस्थान के बंसवारा जिले में 90 शिशु मृत्यु हुईं।

फोटो और लेख साभार: इंडियस्पेंड