हिंसा झेलने वाली आखिर समझौते के लिए क्यों राज़ी हो जाती हैं? महोबा की केसर की कहानी देखकर जानिए

महिलाओं पर होने वाली घरेलू हिंसा और फिर उसके बाद आपसी समझौता बुंदेलखंड की महिलाओं की नियति बन चुकी है। बुंदेलखंड के जिलों में गांवों में रोजाना ही ऐसे मामले देखने को मिल जाते हैं जहाँ महिलाएं अपने ससुराली जनों द्वारा मारी-पीटी जाती हैं, जला दी जाती हैं या उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।

ऐसी ही परिस्तिथियों से गुजर रही है महोबा की केसर, जो पिछल कुछ सालों से अपने ससुराली जनों द्वारा सताई जा रही है लेकिन फिर भी उनके साथ समझौता कर रहने को मजबूर हैं।

केसर बताती हैं, शादी के कुछ ही महीनों बाद से मार-पीट शुरू हो गयी थी। अक्सर दहेज को लेकर पति मारते थे। एक साल बाद सास भी मारने लगीं और फिर तो जैसे सभी को मौका मिल गया था हाथ उठाने का। मेरा देवर भी मुझे मारने लगा था।

केसर की शादी 1992 में हुई और 1995 में पंचायत द्वारा इनका समझौता भी कराया गया। लेकिन मामला तक पुलिस में जा पहुंचा जब केसर ने घर के बाहर गड्ढा खुदा देखा और पास कुल्हाड़ी रखी देखी। बस फिर केसर ने अपने भाई को फ़ोन किया और वहां से भाग निकली।

केसर के बारे में उनके पति रामदयाल का कहना है कि वह अपनी मन-मर्जी करती हैं और कभी भी मायके चली जाती हैं और यह उन्हें पसंद नहीं है।

वहीं केसर के भाई नन्दकिशोर बताते हैं कि उन्हें एक साल से रामदयाल की तरफ से धमकियां दी जा रही हैं। यही नहीं रामदयाल कई लोगों के द्वारा भी उनको धमकियां भिजवा चुके हैं।

केसर कहती है कि उनके पति कुछ काम-धंधा भी नही करते हैं। इस बीच उनकी दो बेटियां भी हुईं जो अब केसर के साथ ही हैं। इतने लम्बे समय से चली आ रही इस लड़ाई के बाद भी केसर अपनी बेटियों के भविष्य को देखते हुए समझौता चाहती हैं। पुलिस केस होने के बाद उन्हें उम्मीद है कि इस बाद शायद उनके पति समझौता कर बेटियों के बारे में सोचेंगे।

रिपोर्टर- सुनीता प्रजापति  

09/06/2017 को प्रकाशित