हर महीना नहीं मिलत रूपिया

A cook prepares food for free mid-day meal for children, distributed by government-run primary school, at Brahimpur villageचित्रकूट जिला के स्कूलन मा मिड्डे मील का खाना बनावैं वाली मेहरियन का हर महीना रूपिया लें खातिर कइयौ महीना तक इंतजार काहे करै का परत हवै?
स्कूलन मा खना बनावैं वाली मेहरियन का हर महीना मिलै वाला एक हजार रुपिया नहीं मिला आय। काहे से कि यहिके खातिर मिड्डे मील मा पचहत्तर परसेंट केन्द्र सरकार अउर पच्चीस परसेंट रूपिया राज्य सरकार कइती से आवत हवै, पै जबै या रूपिया कउनौ भी सरकार कइती से आवैं मा देर होइ जात हवै तौ खाना बनावैं वाली मेहरियन के ऊपर यहिका असर ज्यादा परत हवै।
उनका पूर दिन स्कूल मा खाना बनावैं मा बीत जात हवै, उंई या सोंच के खाना बनावत हवैं कि रुपिया मिली तौ घर के खर्चा मा काम देइ, पै हर महीना खाना का रूपिया न मिलै से उनके समस्या हर महीना घटै के बजाये बढ़तै जात हवै।
अब सवाल या उठत हवै कि खाना बनावैं वालेन का सरकार हर महीना रूपिया काहे नहीं देत आय? एक कइती स्कूलन मा मिड्डे मील का खाना बनब जरूरी हवै। यहिसे बच्चन का स्वास्थ्य सुधरी अउर बच्चन का कुपोषण से बचावा जा सकत हवै, पै खाना बनावैं वाली मेहरियन का हर महीना रूपिया न मिलैं से उनका दोहरी मार सहंै का परत हवै।
खाना बनावै का रुपिया हर महीना नहीं मिलत तौ उनके घर मा चार चार दिन तक चूल्हा तक नहीं जलत आय। काहे से हर महीना रूपिया न मिलै से उनके बच्चन का भविष्य खतरे मा हवै। का इनतान मा सरकार आपन मकसद तक पहुंच सकत हवै? जबै तक सरकार जमीनी स्तर के समस्या का न समझी तबै तक यहिनतान समस्या बनी रहिहै?