स्वास्थ्य विभाग पर खड़ा हुआ सवाल

(फोटो साभार: विकिपीडिया)
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उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड इलाके के दो बड़े जिले हैं चित्रकूट और बांदा। दोनों जिलों को मिलाकर कुछ तीस लाख की आबादी है। इतनी जनसंख्या पर भी स्वास्थ्य सेवाओं पर नज़र डालें तो बहुत ही गंभीर स्थिति सामने आती है।
जिला बांदा, ब्लाक बबेरू, ग्राम पंचायत मुरवल का मजरा रमपुरवा। यहां की रहनेवाली रामकली गर्भवती थी। 12 जून 2013 को दिन लगभग बारह बजे भरी बाजार में मुरवल बस स्टाप चैराहे की सड़क में उसका बच्चा पैदा हुआ। रामकली के परिवार वाले और आशा बहू मुन्नी रामकली को लेकर सुबह 6 बजे अस्पताल के लिए घर से निकले। मुरवल में मात एंव शिशु परिवार कल्याण केन्द्र है लेकिन कभी खुलता नहीं है। बबेरू और बांदा दूर होने के कारण रामकली अस्पताल तक नहीं पहुंच पाई और बच्चा रास्ते में ही पैदा हो गया। रमपुरवा से मुरवल ग्राम पंचायत तीन किलोमीटर दूर है। मुरवल में अस्पताल होने के बावजूद भी लोगों को लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर बबेरू सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र या फिर लगभग तीस किलोमीटर बांदा शहर जाना पड़ता है।
बांदा के ही तिन्दवारी ब्लाक का गांव गोधनी है जहां का मातृ एवं शिशु परिवार कल्याण केन्द्र हमेशा बन्द रहता है। जिले के ए.सी.एम.ओ. डाक्टर ओ.पी. माहौर का कहना है कि जिले में 285 मातृ एवं शिशु परिवार कल्याण केंद्र हैं और स्टाक की कमी के कारण सिर्फ 192 को लाभ मिल पा रहा है।
जिला चित्रकूट ऐसे तो पर्यटन स्थल है पर विकास की बात करें तो सिर्फ नाम क लियेे है। अस्पताल तो बने हैं परन्तु कहीं डाक्टर की कमी तो कहीं दवा की कमी या फिर अस्पताल में किसी भी प्रकार की सुविधा है ही नहीं। जिले के पांचों ब्लाक के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में बहुत सी कमियां पाई गईं। ब्लाक रामनगर, गांव कटैयाखादर, की गुजरतिया ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में सफाई नहीं रहती है। पलंग की चादरें गंदी रहती हैं जबकि चादर रोज बदलने का नियम है।
ब्लाक मऊ, गांव सुरौधां को महादेव पुरवे और ताड़ी गांव के पटोरी पुरवे की रजनिया और बुधिया का कहना है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में नाष्ता नहीं मिलता और बिजली भी नहीं रहती है। गर्मी से मरीज़ बहुत ही परेषान होते हैं।
ब्लाक कर्वी के कल्ला गांव के केसरिया का कहना है कि षिवरामपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में लड़का पैदा कराने 9 जून 2013 को गए थे तो दो सौ रुपये डाक्टर ने लिए जबकि ये सेवा मुफ्त में मिलनी चाहिए।
जिला के अधिकारियों से पूछने पर सबका कहना है कि सारे काम नियम से होते हैं जबकि आंखों देखी और मरीज़ों की बातों से कुछ और ही सच्चाई सामने आती है।