सूखे से पलायन को मजबूर

sukhaबुंदेलखंड का सूखा देश ही नहीं दुनियाभर में चर्चा का मुा बना। 2009 में बुंदेलखंड को सूखे से उबारने के लिए पैकेज भी जारी किया गया। 3506 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश के जि़लों के लिए और 3760 रुपए मध्यप्रदेश के जि़लों के लिए। 2014 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने रिपोर्ट जारी की। 2004-05 में पच्चीस प्रतिशत बारिश कम हुई तो 2006-07 में तैंतालीस प्रतिशत और 207-08 में छप्पन प्रतिशत की कमी हुई। यानी साल दर साल बारिश का प्रतिशत घटता रहा। सूखे से निपटने के लिए पैकेज जारी करने के बाद भी स्थिति सुधरने की बजाए लगातार खराब हो रही है। सवाल उठता है कि बुंदेलखंड के हालात सुधरने की बजाए लगातार खराब क्यों हो रहे हैं। यह आर्थिक मदद कहां जा रही है।

महोबा। अतिसूखाग्रस्त इलाकों में से एक महोबा में हालात बेहद खराब हैं। पिछले तीन साल से यहां लगातार सूखा पड़ रहा है। इस बार यहां तैंतिस प्रतिशत से भी कम बारिश हुई है। यहां गांव के गांव पहली बार पलायन करने की तैयारी में हैं। जानवरों को आधे अधूरे दामों में बेच रहे हैं। औरतों के ज़ेवर बिकने शुरू हो गए हैं। स्कूलों और काॅलेजों से बच्चे नाम कटा रहे हैं।
जैतपुर ब्लाॅक के गांव लाड़पुर के रहनेवाले मुन्नी लाल ने बताया कि पिछले तीन सालों में वह पंद्रह बीघे खेती बेच चुके हैं। अब उनके पास करीब पंद्रह बीघे खेती और बची है। ‘अब तो गांव में खरीददार भी नहीं मिल रहे हैं। मेरे एक पोता और एक पोती हैं। पोती दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। पोता एक में। दोनों का स्कूल बंद करा दिया है। औरत के जे़वर भी बेच दिए हैं। दो बकरी और एक भैंस है। उसे भी बेचना पड़ेगा। मगर बेचे  भी तो किसे? कोई खरीददार नहीं मिल रहा है। हमने तिल, उड़द, मूंग बोया था। पांच बीघा तिल, पांच बीघा उड़द पांच बीघा मूंगफली। हमें कुल मिलाकर बारह कुंटल दाना मिलना चाहिए था। मगर मिला कुछ तीन से चार किलो। बीज का पैसा भी नहीं निकला। हम छह सौ रुपए प्रति घंटा के हिसाब से तीस घंटे भी अगर जुताई कराएं तो करीब अट्ठारह हज़ार रुपए तो केवल जुताई का होता है। उसपर एक बीघे में करीब डेढ़ हज़ार रुपए की दवाई छिड़की गई। बीज का पैसा, मज़दूर का पैसा। सब मिलाकर सत्तर हज़ार के करीब लागत आई मगर मिला क्या? कुछ नहीं। 2008 में बैंक से दो लाख रुपए कजऱ् लिए थे। अब कर्ज़ माफ हो या न हो। हम चुका ही नहीं पाएंगे। दोनों बेटे दिल्ली काम की तलाश में जाने की तैयारी में हैं। हमें इतने नुकसान के सात हज़ार रुपए मिले हैं। इसमें क्या करें?’
मोहारी गांव के रामप्रसाद ने बताया कि ‘हमारे पास दो एकड़ ज़मीन है। मूंगफली बोई थी। एक भी दाना नहीं हुआ। अब मूंगफली के खेतों में झाड़ खड़े हैं। इन्हें जानवरों को खिला रहे हैं। इस गांव में सभी का यही हाल है। हर किसान कर्ज़ में है। हमने 2010 में एक लाख रुपया कजऱ् लिया था। यहां तो खाने के लाले पड़े हैं। चुकाने के बारे में सोचा भी नहीं। लड़का काम की तलाश में सूरत जाने की तैयारी में है। इस बार पूरे गांव के जवान लड़के पलायन करेंगे। बुड्ढे ही बचेंगे। हमारे गांव में किसी ने आत्महत्या नहीं की है। मगर अब लगता है कि बुड्ढों को ज़हर खाकर जान देनी पड़ेगी। मेरे बेटे की एक बेटी तीसरी कक्षा में पढ़ती है और बेटे ने अभी स्कूल जाना शुरू किया था। मगर अब सोच रहे हैं कि पढ़ाई छुड़ा दें।’
राजेश, अत्तरपट्ठा गांव, जैतपुर ब्लॉक ’हम तो कुछ भी करके खा लेंगे लेकिन ये बेचारे जानवर भूखे परेशान हैं। तालाब और ज़मीन सब सूखे हैं, उनके खाने-पीने के लिए कुछ नहीं है। बहुत से लोग अपने जानवरो  को बेच देते हैं कम दाम में या जाके जंगल में छोड़ आते हैं।‘ साहूकार और बैंक से कर्ज़ लिया है कुल मिलाकर ढ़ेड़ लाख। पांच साल हो गए हैं कुछ लौटा नहीं पाए हैं। बैंक अगर सात प्रतिशत, का ब्याज लेता है तो साहूकार चैदह प्रतिशत।’

सूखे खेत मगर सूखाग्रस्त नहीं बनारस

बनारस। पहले बेमौसम बरसात उसके बाद अब सूखा। किसानों को उम्मीद थी कि जि़ले को सूखाग्रस्त घोषित किया जाएगा। मगर उत्तर प्रदेश के सूखा घोषित किए गए पचास जि़लों की लिस्ट में बनारस नहीं है।
बनारस में काशी विद्यापीठ के रोहनियां में रहने वाले संतोष और पुष्पा का कहना है कि बारिश के बाद हमारी फसलें तबाह हुईं। फिर खेतों में सूखा छाया। लेकिन सरकार ने न जाने क्यों बनारस को सूखा घोषित नहीं किया। अब हम क्या खाएं? किससे कहें? कहां जाएं? सेवापुरी के बबलू, राजू और संजय का कहना है कि बरसात न होने से धान पूरा सूख गया। खेत तो सूखे पड़े हैं। पर सरकार कह रही है कि बनारस में सूखा नहीं पड़ा। आंखों देखी सच मानें या सरकार की बात?
अपर जि़लाधिकारी डाॅक्टर महेन्द्र कुमार राय ने बताया कि साठ प्रतिशत तक बारिष होने और तीस प्रतिषत तक फसल बर्बाद होने की रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी। कृषि अधिकारी डाॅक्टर संजय सिंह का कहना है कि पच्चीस से तीस प्रतिषत तक फसलों का नुकसान सरकार को भेजा गया था। फसलों का नुकसान तैंतीस प्रतिषत से कम होने के चलते बनारस में सूखा घोषित नहीं किया गया है।