सूखे में “नारी शक्ति की भागीदारी” बढ़ाने पर उठा सवाल!

06867bbc-97d6-446c-bbb5-7937ab6f915f copy7 मई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पानी के संकट और व्यवस्था को लेकर दिल्ली में बैठक की।
चर्चा के बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि सूखे की व्यवस्था में समाज और खासकर ‘नारी शक्ति’ की भागीदारी बढ़नी चाहिए। लेकिन शायद प्रधानमंत्री यह बात नहीं जानते कि इस सूखे की सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर ही पड़ी है।
दरअसल, ग्रामीण इलाकों में महिला ही हैं जो घर की जीविका चलाने के लिए उपाय सोचती हैं। वह खेती के काम के साथ-साथ घर, बच्चे और पशुओं का पालन-पोषण भी करती हैं।
इस बार के सूखे में भी सबसे ज्यादा अगर किसी को फर्क पड़ा है तो वह महिलाएं ही है।
जबकि पुरुष किसान और बाकी युवा घर-परिवार छोड़ पलायन कर रहे हैं। फिर प्रधानमंत्री कैसे इस हकीकत से अछूते रह गये?
यही नहीं, हालात यहां तक है कि सूखे और पानी की कमी के कारण परिवार भूखे मरने को आतुर हैं लेकिन महिलाएं ही बिना राशन और पानी के अपना परिवार चला रही हैं। सरकार ने कभी इन प्रयासों को नहीं देखा, ना उन लड़कियों के बारे में सोचा है जो अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर दिन-दिन भर सिर्फ पानी भरती रहती हैं।
गौरतलब है कि गांव में मनरेगा का काम नहीं मिल रहा हैं, लेकिन दूसरी तरफ आज मनरेगा के कामों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रहा है.
यह बड़ी ही निराशाजनक बात है कि केंद्र और राज्य सरकार ऊपर-ऊपर से ही अंदाजे लगा कर आंकड़े तैयार कर रही है।
क्या प्रशासन ने कोई आंकलन किया है कि सूखे का कुपोषण पर क्या प्रभाव है, या गर्भवती महिलाओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है?
क्या सरकार ने कोई जांच की है कि कितनी लड़कियां पानी की वजह से स्कूल और कॉलेज जाना बंद कर रही हैं?
क्या सरकार के पास जानकारी है कि कितनी लड़कियों की शादी सूखे और पानी के कारण रुक गयी है? क्या यह बातें जानना हमारे लिए जरूरी नहीं है?
दरअसल सरकार उन बातों को उठाती है जिससे उसे लाभ हो। सरकार ने अपना उल्लू सीधा कर लिया लेकिन अब सवाल यह है कि इस सूखे के संकट में कौन याद रख रहा हैं महिलाओं के योगदान को?

वह
समाज में
न्याय न पाकर
अन्यायों की चोट दबाकर
भरी देह का
नेह सुखाकर
खाकर ठोकर
रोम दुखाकर
अपने सपने
धूल बनाकर
कर से कर पर की मजदूरी,
पग से
हर, पल-पल की दूरीय
जीवन जीती हैं
अनचाहा
दुःख-दारिद पीती अनथाहा।
-केदारनाथ अगरवाल