सूखे के लिये जिम्मेदार कौन ?

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महाराष्ट्र राज्य में चालीस सालों में सबसे गंभीर सूखा इस साल पडा है। यह ऐसा राज्य है जहां लगभग चार हज़ार छोटे-बड़े बांध हैं। पिछले दस सालों में सिंचाई की योजनाओं में लगभग सत्तर हज़ार करोड़ रुपये खर्च किये गए हैं। चैंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद राज्य में सिर्फ अट्ठारह प्रतिशत ज़मीन में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि साल 1972 में बारिष न होने की वजह से सूखा पड़ा था लेकिन इस साल कारण कुछ और है। माना जा रहा है कि सरकार की नीतियां, घूसखोरी, पानी की कुछ जगहों में बर्बादी और दूरगामी दृश्टि न होना सूखे का मुख्य कारण हैं।
महाराष्ट्र में ऐसे बांध बनाए गए हैं जिनका सत्तर प्रतिषत पानी गन्ने के खेतों में जाता है। बाकी का पानी पीने के काम में इस्तेमाल होता है। ऐसे में अन्य फसलों के लिए पानी बचता ही नहीं है। गन्ने की खेती में बहुत ज़्यादा पानी लगता है। सूखा ग्रस्त इलाकों में ऐसी फसल को सरकार क्यों बढ़ावा दे रही है? इन्हीं इलाकों में शराब की फैक्ट्रियां भी हैं जिनमें भी बहुत ज़्यादा मात्रा में पानी इस्तेमाल होता है। साथ में यहां ऐसे घर बनाए गए हैं जिनमें साथ में तैरने के लिए स्विमिंग पूल भी हैं। रहने वाले अपने ही घर में तैरने का मज़ा ले सकते हैं। क्या सरकार नहीं देख सकती कि जहां लोगों पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं और जहां फसलें बर्बाद हो रही हैं, वहां पानी की ऐसी बर्बादी घोर अन्याय के बराबर है?
यह स्पश्ट है कि सरकार की नीतियां अमीरों के लिए हैं। इनमें से बहुत से लोग खुद सरकार में मंत्री भी हैं। उप मुख्य मंत्री अजीत पवार के रवैये से भी पता चलता है कि गरीबों के बारे में उनकी क्या सोच है। ये मंत्री अपने हित के बारे में ही सोच रहे हैं, आम जनता के बारे में नहीं। यह बेहद अफसोस की बात है कि हमारे देष में पीने के पानी और सिंचाई की व्यवस्था पूरी तरह से सरकार के ही नियंत्रण में है। जहां सरकार अपने बारे में सोचने में व्यस्त है, वहां छोटे किसान और गरीब जनता क्या कर सकती है? षायद दूसरी जगहों में पलायन करना, धरने पर बैठा और कुछ न मिलने पर आत्महत्या करने के अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं है।