सरकार जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के बाज़ार पर ध्यान क्यों नहीं देती?

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मीरा देवी

मैं पिछले हफ्ते राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर रिर्पोटिंग के लिए गई थी। जंतर मंतर दिल्ली की बहुत ही प्रसिद्ध जगह है जहां पर लोग अनशन व धरना प्रदर्शन करते हैं। मैंने बुंदेलखण्ड में भी धरना स्थल की खबर रिपोर्ट की है। अगर लोग धरने पर बैठते हैं तो प्रशासन को दो चार दिन के बाद उसकी खैर खबर लेने जाना ही पड़ता है। कार्यवाही भी करनी पड़ती है। पर जंतर मंतर में देखने को मिला कि धरना देने वालों का बाज़ार लगा है। कोई उत्तर प्रदेश से कोई बिहार से तो कोई झारखण्ड से है। अलग-अलग राज्यों के लोग यहां धरने पर सालों से बैठे हैं। उनकी कोई खैर खबर लेने वाला नहीं है, न ही अधिकारियों को कोई फर्क पड़ता है। मीडिया के लोग भी कभी कभार पहुंच जाते हैं। मुझे तो लोगों ने ऐसे पकड़ा कि बस मैं सब की खबर को रिपोर्ट करूं और अधिकारियों तक पहुंचाऊ।इसके अलावा यह भी देखने और सुनने को मिला कि जिस जगह पर अपने अधिकार, हक और न्याय की लड़ाई के लिए जाते हैं वहीं ही अपने अधिकार, हक और न्याय छिन जाते हैं।

सबसे ज़्यादा महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का सवाल है। सुरक्षा के लिए आने वाली पुलिस ही शारीरिक शोषण करने का दांव लगाए रहती है। छानबीन करने के बहाने से उनकी झुग्गी झोपड़ी में घुसकर शोषण करने के उपाय ढूढती है। पीने के पानी और मूत्रालय नहीं हैं। इसी कारण बीमारियां डेरा डाले हैं। जो अनशनकारी अमीर हैं वही गरीबों का खाना-पानी छीन लेते हैं और यहां तक कि पिटाई भी कर देते हैं। अनशनकारियों को उनके दुश्मनों द्वारा उस जगह में ही खुले आम धमकियां दी जाती हैं पर दिल्ली का न प्रशासन और न ही पुलिस कोई मतलब रखती है।
यह सब देखकर मुझे समझ में आया कि बुन्देलखण्ड में कई लोग कार्यवाही की उम्मीद में केंद्र सरकार तक अपनी अर्जि़यां फैक्स के ज़रिए भेजते हैं। जब यहां की सरकार अनशन करने से प्रभाव में नहीं आती तो क्या भरोसा कि फैक्स की गई अर्जि़यां कभी खोली भी जाती हों?