सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के दावे झूठे #toiletekpremkatha

साभार: ट्विटर/स्वच्छ भारत

जनवरी 2015 से दिसंबर 2016 के बीच देश भर के 51.6 फीसदी परिवारों ने एक बेहतर स्वच्छता सुविधा का उपयोग नहीं किया है।

स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के दिशा निर्देशों में स्पष्ट रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की स्वच्छता की स्थिति का एक वार्षिक, देशव्यापी, स्वतंत्र तृतीय-पक्ष मूल्यांकन की कल्पना की गई है, लेकिन अब तक इसकी स्वतंत्र रुप से कोई निगरानी नहीं है।

विश्व बैंक ने स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के लिए डेढ़ अरब अमरीकन डॉलर का ऋण देने का वादा किया था। लेकिन विश्व बैंक ने जुलाई 2016 की पहली किस्त जारी नहीं की है, क्योंकि भारत ने एक स्वतंत्र सत्यापन सर्वेक्षण के संचालन और घोषणा की शर्त पूरी नहीं की है, जैसा कि जनवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

वर्ष 2014 से अब तक 4 करोड़ घरेलू शौचालयों का निर्माण किया गया है। 22 मई, 2017 को स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) वेबसाइट के अनुसार 1 मई और 21 मई 2017 के बीच, देशभर में करीब चार लाख 90 हज़ार व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण किया गया। प्रति दिन लगभग पच्चीस हज़ार शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। बेहतर स्वच्छता सुविधा का अर्थ ऐसी प्रणाली के प्रयोग से है जो मल को मानव संपर्क से दूर करता है। इसमें पाइप सिवर प्रणाली, सेप्टिक टैंक, गड्ढे शौचालय आदि शामिल हैं।

वर्ष 2014 में खुले में शौच करने के उच्च दर के साथ पांच राज्यों में तीन हज़ार दो सौ  परिवारों के साथ एक सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान सवालों का जवाब देने वाले 47 फीसदी लोगों ने कहा कि वे इसलिए खुले में जाते हैं क्योंकि यह सुखद, सुविधाजनक और आरामदायक है। एक गैर-लाभकारी संस्था रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैशनेट इकोनॉमिक्सद्वारा आयोजित एक अध्ययन में पाया गया कि जिन घरों में शौचालयों का निर्माण हुआ था, उनमें से 40 फीसदी ऐसे परिवार थे, जिनका कम से कम एक सदस्य अब भी खुले में शौच जाता है।

अकाउन्टबिलिटी इनिशटिवके बजट ब्रीफ के अनुसार, वर्ष 2016-17 के वित्तीय वर्ष के दौरान, जनवरी 2016 तक आई ई सी पर मात्र 1 फीसदी खर्च किया गया था। इसके विपरीत, 98 फीसदी धन व्यक्तिगत घरों में शौचालयों के निर्माण पर खर्च किए गए थे।

दिसंबर 2015 के अध्ययन में 10 जिलों और पांच राज्यों में सात हज़ार पांच सौ घरों में सरकार के स्वच्छता के हस्तक्षेप के लाभार्थियों पर निगरानी रखते हुए प्रतिरुप प्रविष्टियां, लाभार्थियों की सूची में मरे हुए लोगों के नाम और लापता परिवार ऐसे बाधा थे, जिसका सामाना अकाउन्टबिलिटी इनिशटिव ऑफ सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्चके शोधकर्ताओं को सामना करना पड़ा ।

आखिरकार, उन्होंने डेढ़ हज़ार  घरों का अध्ययन किया, जिन्हें वे सूची से पहचान सकते थे। उन्होंने पाया कि सरकारी रिकॉर्ड में स्वच्छता की स्थितिहासिल किए गए एक तिहाई परिवार में वास्तव में शौचालय थे, जबकि 36 फीसदी ऐसे शौचालय का निर्माण किया गया था, जो उपयोग करने लायक नहीं थे। शौचालय के साथ वाले परिवारों में कम से कम एक सदस्य ऐसा था, जो खुले में शौच जाता है। इसके पीछे सबसे सामान्य कारण पानी का अभाव और गड्ढे बहुत छोटा होना है।

इसके अलावा, शौचालय बनाने के लिए सरकार से पैसे के लिए आवेदन देने वाले 40 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्हें राशि प्राप्त नहीं हुई है।

स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) वेबसाइट के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में 31 लाख (88 फीसदी) घरेलू शौचालय बनाए गए हैं। हम बता दें कि वर्ष 2017-18 के लिए 35 लाख शौचालय निर्माण का लक्ष्य रखा गया था। इसके अलावा, दो लाख चार हज़ार के लक्ष्य की तुलना में केवल से केवल 56 फीसदी समुदाय शौचालय बनाए गए हैं।

वर्ष 2015-16 में जारी कुल राशि का 25 फीसदी ठोस कचरा प्रबंधन और शौचालय निर्माण के लिए था और 70 फीसदी शौचालय निर्माण के लिए था। वर्ष 2016-17 में जारी कुल राशि का 45 फीसदी धन ठोस कचरा प्रबंधन और 45 फीसदी शौचालय निर्माण के लिए था। अध्ययन के अनुसार, गुजरात, असम और केरल सहित छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अब तक कार्यक्रम शुरू होने के बाद से ठोस कचरा प्रबंधन के लिए कोई धन प्राप्त नहीं हुआ है।

विश्लेषण में कहा गया है कि वर्ष 2016-17 के वित्तीय वर्ष में 18 जनवरी 2017 तक, 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ठोस कचरा प्रबंधन के लिए अब तक कोई धन प्राप्त नहीं हुआ है।

साभार: इंडियास्पेंड