सरकार के बजट मड़इन के उम्मीद पूर करी पाई कि नहीं!

किसान बजट खातिर सोचत हवैं

2017 अउर 2018 का बजट वित्तमंत्री अरुण जेटली 1 फरवरी का पेश कई दिहिस हवै। पै का सरकार के बजट से मड़इन के जेब भर पाई। सरकार का कहब हवै कि कमजोर वर्ग का या बजट से बहुतै फायदा हवै। फायदा तौ एक साल बादै पता लागी काहे से कहै अउर करै मा जमीन आसमान का अन्तर होत हवै। साल मा तीन लाख रुपिया कमाई करै वाले मड़इन का या बजट मा टैक्स के छूट हवै। पै सोचै वाली बात तौ या हवै कि जबै कमाये खातिर रोजगार होइ तबहिने तौ मड़ई के लगै तीन लाख रुपिया होइ। हिंया मड़ई खाय का लाचार हवै सरकार टैक्स छूट के बात करत हवै।
रेल व्यवस्था खातिर एक करोड़ इक्कतीस लाख रुपिया खर्चा किन जई। रुपिया चाहे जेत्ता खर्चा करै सरकार के लगे दुघर्टना रोकै खातिर कउनौ हल हवै रेल व्यवस्था चाहे जेत्ती बढ़ जाये पै गरीब जनता का कउनौ सुविधा नहीं मिलत आय। बजट नाम खातिर बस होत हवै। सरकार रोजगार दे खातिर बजट मा कुछ नहीं रखिस। देश मा लाखोँ बेरोजगार मड़ई दर-दर ठोकर खात हवैं। हिया तो मनरेगा का काम भी नहीं मिलत आये यहै कारन मड़ई आपन गांव छोड़ छोड़ परदेश कमायें जात हवैं।
बजट मा सरकार भले गरीब ,गांव अउर किसान खातिर करोड़न रुपिया के बात करत हवै। पै या तौ हर बजट मा होत हवै। पै अगर पलट के देखा जायें तौ देश का गरीब, पिछड़ा गांव अउर किसान आज भी विकास से मीलन दूर हवै। तो सरकार कउनतान के विकास के बात करत है।
हर साल के जइसे या साल भी किसानन का फसल बीमा योजना मा ज्यादा रुपिया दे के बात कहत हवै। पै 2016 -2017 के बजट अगर पलट के देखा जाये तौ तेरह करोड़ दुई लाख चालिस हजार रुपिया का बजट रहैं किसान बीमा योजना मा 2017 -2018 मा वहिका बढ़ा के चौदह करोड़ एक लाख छह सौ पचीस रुपिया कई दीन गा हवै। पै योजना के सच्चाई अगर बुन्देल खण्ड के किसान से पूछौ तौ पता चलत हवै कि उनका तौ फसल बीमा का कउनौ फायदा नहीं मिला आय। तो का फायदा नाम खातिर बजट बढ़ाबे से ।
आज भी 2016 -2017 के फसल खराब होय वाला बीमा किसानन का नहीं मिला आय तौ सरकार का बजट मा संख्या बढ़ाये बस से कुछौ न हो। काला धन रोके खातिर सरकार पचीस करोड़ रुपिया खर्च करै का लक्ष्य रखिस हवै। मेहरियन खातिर बजट मा बहुतै कम जघा देखात हवै उनका गर्भवति होये के समय सरकार छह हजार रुपिया उनके खाता मा डाली। पै सरकार यहिके अलावा स्वास्थ्य सुरक्षा अउर शिक्षा मा कुछ नहीं पेश करिस आय। गर्भवति मेहरियन खातिर छह हजार रुपिया के बात करिन हवै। पै वा रुपिया मिली कइसे। हिंया तौ बच्चा होये के बादौं मड़इन बैंकन के चक्कर काटत रही जात हवैं ।
चित्रकूट के सैकड़न मड़इन का कहब हवै कि सरकार जानबूझ के चुनाव के पहिले बजट पेश करिस हवै जेहिमा वोट समेट सकै। चुनाव के बाद बजट कागजन मा ठण्डा होइ जई मड़ई वहिनतान हिंया हुआ भटकत रही जई किसान फसल खातिर बीज का भटकत हवै गरीब मड़ई आपन सुनवाई का भटकत हवैं। सरकार का बजट हम गरीबन खातिर कत्तौ नीक नहीं रहै सबहिन से वोट बटोरत हवै बाद मा हाथ हिला देत हवैं। सही देखा जाये तो सरकार नोट बंदी के हिसाब से बजट पेश करिस हवै। यहिमा गरीबन का कउनौ फायदा नहीं आया पै अमीरन का जरुर से फायदा होइ।