शिक्षा का अधिकार तो है सबको,पर राह नहीं है आसान। देखें बांदा, महोबा का हाल

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 देश के छह से चौदह साल के हर बच्चे को दे रहा है। निशुल्क शिक्षा सरकारी विद्यालय के मुक्त शिक्षा देने के साथ निजी स्कूल को 25% गरीब लड़का तक के बच्चों को मुक्त शिक्षा देगें। पर क्या ये जमीनी स्तर में होते हैं। बांदा, महोबा जिला के निजी विद्यालयों में हमने यही जानने की कोशिश की।

बीएसए साहब नहीं मिले हैं। विभाग से पता चला है कि जो लोग अपने बच्चों का एडमिशन प्राइवेट स्कूलों में कराना चाहते हैं और जो बीपीएल परिवार से हैं। उन बच्चों को आनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाकर लाटरी सिस्टम के मध्यम से उनका चयन होता है। उन बच्चे का एडमिशन होता है। 2016-17 में मात्र चौहत्तर बच्चों का एडमिशन हो पाया है। जो बीपीएल परिवार से हैं और प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। कुल 225 स्कूल हैं जहां पर इस कानून के तहत पर 25% एडमिशन होना अनिवार्य है। लेकिन सिर्फ 74 बच्चे ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है।  25% गरीब बच्चों का दाखिला न होने के साथ निजी विद्यालयों की बढ़ती फीस और हर साल किताबों में होने वाले बदलाव अभिभावकों को आर्थिक रूप से समस्या बढ़ रही है।

प्रबंधक सरस्वती शिशु मन्दिर के किशोर कुमार बाजपेयी का कहना है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम के अंतर्गत एडमिशन लेना चाहते हैं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है। इस साल ऐसे कोई बच्चें नहीं हैं।

प्रधानाध्यापिका सरस्वती बालिका विद्दा मन्दिर कि अमिता सिंह ने बताया कि लगभ ऐसे बीस बच्चें हैं। 5% बांकी हैं, लेकिन हम लोग लगे हैं कि उनको भी लाभ दिया जाये। ये रेसियों पिछले साल का है, हमारे ही विद्या भारती निशुल्क उपेक्षित बच्चों का चल रहा है। खबर करते हैं तो ऐसे बच्चों की सूची भी हमारे पास है। सम्पर्क के दौरान हम मदद कर देते हैं। कि आप अपने बच्चों को हमारे स्कूल में लाइये।

सरस्वती शिशु मन्दिर का छात्र अलीरजा ने बताया कि मम्मी इंटर लाक और सिलाई मशीन चलाती है और पापा कारखाने जाते हैं। अभिभावक महोबा के गुलाब का कहना है कि जो इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले बच्चों को आगे सर्विस मिल जाती है। वादा के हिसाब से फीस ज्यादा ले लेते हैं। इंग्लिश मीडियम स्कूल की खुद की किताबें हैं। गरीब आदमी थोड़ा बहुत पढ़ा सकता है।

अभिभावक महोबा मुबारक हुसैन का कहना है कि इस समय एल के जी की फीस  ड्रेस किताबें को लेकर साढ़े नौ हजार रुपिया है। संसोधन में पांच एडमिशन के खाली लगते हैं। ड्रेस, कापी, किताबें, अलग से लगती है।

प्रधानाध्यापिका श्रीमती विद्दा रानी मेमोरियल जूनियर हाईस्कूल आंसमा का कहना है कि हम पढ़ाई से जुडी चीजे सब देखते हैं। एक ही दुकान से किताबें आती हैं। सेंट जोसफ जूनियर के प्रधानाचार्य फादर विंसेट का कहना है कि दो तीन किताबें मिलता है। जो बोर्ड की तरफ से परमिशनल है वो ही मिलती है। बांकी कोई बुक नहीं मिलती है। बीएससी बाले बदलते हैं।

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी महोबा के अमित कुमार ने बताया कि सरकार सख्ती का काम करती है। निरीक्षण तो करते हैं लेकिन अभी देखा नहीं है। पिछले साल कार्यवाही भी किया था। किताबों का दाम बढ़ने को लेकर डीएम साहब से बोले थे। शिक्षा का अधिकार 2009 में बनने के बाद भी शिक्षा के स्तर में कोई सुधार नहीं है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का बेकार स्तर कहीं न कहीं निजी विद्यालयों की मनमानी बढ़ रही है।

रिपोर्टर: मीरा बांदा और सुनीता प्रजापति

Uploaded on Apr 30, 2018