विकास करावैं का आपन-आपन फण्डा

divalee gavबुंदेलखण्ड के बांदा अउर चित्रकूट जइसे जिलन मा गांव के विकास करैं खातिर कतौ ग्राम पंचायत का पुर्नगठन (परिसीमन) तौ कतौ संासद गोद लें का काम करत हैं। योजना लावैं या पुरान योजना का नवा रूप दइके बहुतै आसानी से वाहवाही बटोरी जा सकत है। पर विकास खातिर ठोस योजना अउर इरादा के जरूरत होत है। जउन कि कउनौ योजना मा नहीं देखात आय। गांव का गोद लेब योजना एक सराहनीय कदम है, पै यहिके समय सीमा भी तय होय कि विकास कबै तक होई?
विकास का काम करैं के पीछे अलग-अलग सरकार आपन हिसाब से नाम देत है। चाहे वा अम्बेडकर गांव होय, लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना होय, निर्मल गांव होय या फिर अब अपनाये जाय वाले परिसीमन अउर गोद लें के व्यवस्था होय। अबै तक अम्बेडकर, लोहिया अउर निर्मल गांव के विकास के स्थिति मा कउनौ ज्यादा सुधार नहीं नजर आवत है। अगर हम संासद के गांव गोद लें के बात करी तौ सवाल या उठत है कि पहिले खुद के गांव का विकास काहे नहीं कीन जात आय? काहे से बांदा जिला के कटरा कालिंजर का लीन गा? अगर कटरा कालिंजर पर्यटन स्थल है तौ यहिसे आम जनता का कउन फायदा है? यहिनतान अगर परिसीमन के बात कीन जाय तौ यहिके तहत उंई मजरा का काहे लीन गा जउन पहिले से लोहिया गांव रहै। जइसे कि दिवली गांव 2013-14 मा लोहिया गांव भा रहै वहिका विकास तौ होई जाय का चाही, पै वहिका अब नई ग्राम पंचायत भी बनावा गा है। इनतान मा सीधे सरकारी धन का दुरूपयोग है। अब इं दुई कार्यक्रम सफल होइहैं या पुरान कार्यक्रम के जइसे खस्ताहाल रहि जइहैं?