लिंग भेदभाव मिटाते बिहार के राकेश कुमार

साभार: पिक्साबे

बिहार के छपरा के रहने वाले 42 साल के राकेश कुमार सिंह भारत की साइकिल पर सैर पर निकले हैं। इस सैर में उनके साथ हैं, बहुत सारे सवाल। राकेश के सामने ये सवाल तब खड़े हुए, जब 2014 को एक लड़की पर तेजाब फेंका गया। इन ही सवालों के जवाब ढ़ूंढ़ने के वह निकले हैं। राकेश अभी तक तमिलनाडू, केरल, पांडिचेरी, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में जा चुके हैं। वह इन दिनों महाराष्ट्र में हैं।
वह लोगों से पूछते हैं कि बेटी बचाओ का नारा बुलंदी पर है, मगर कोई ये क्यों नहीं बताता कि बेटी को किससे बचाना है? हम एक ऐेसे समय में जी रहे हैं, जहां एक बेटी को उसके ही मां-बाप से बचाने की जरुरत है।
वह स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और चाय से पान की दूकान तक में इन प्रश्नों को पूछ रहे हैं। राकेश कुमार की इस सैर में उनके पास सामान के नाम पर एक साइकिल, पानी की बोतल, दानपात्र और लैपटॉप हैं। उनकी साइकिल में एक झंडा हैं, जिस पर ‘राइड फॉर जेंडर फ्रीडम’ लिखा हैं। ये झंडा उनके मां ने उन्हें सिलकर दिया है। वह साढ़े सत्रह हजार किलोमीटर तक साइकिल चला चुके हैं और साढ़े पांच लाख लोगों से ये सवाल पूछ चुके हैं। वह इस अभियान की 2018 के अंत तक बिहार के छपरा में पूरा होने की आशा करते हैं।
राकेश ने ये यात्रा 2014 के मार्च महीने में चेन्नई से शुरु की थी। वह लंबे समय तक दिल्ली और भोपाल में मीडिया रिसर्चर और कॉरोपोरेट कम्यूनिकेटर के तौर पर काम कर चुके हैं। इस यात्रा में वह अलग क्षेत्र के लोगों की लैंगिक भेदभाव पर विचार जानना चाहते हैं, जिससे वह एक शोध की तरह कर रहे हैं।
साभार: यूथ की आवाज़