‘लड़की हैं, गलती से अध्यक्ष बन गयीं’- ऋचा सिंह, इलाहबाद पश्चिम की सपा प्रत्याशी

जिला इलाहाबाद। 30 साल की ऋचा सिंह को पश्चिमी इलाहाबाद से विधान सभा चुनाव का टिकट मिला है। साधारण सी दिखने वाली ऋचा में गजब-सा विश्वास है। अपनी बात को प्रभावी ढंग  से कहने के साथ ऋचा के विचारों में स्पष्टता भी है। आजकल अपने चुनाव प्रचार में ऋचा इस क्षेत्र में बसपा के 10 सालों के शासन की पोल खोलते हुए कहती हैं कि यहां पिछले 10 सालों से कोई विकास नहीं हुआ है। वह खुद के यहां से विधायक बनने पर कॉलेज, अस्पताल, सड़क निर्माण, महिला सुरक्षा और रोज़गार पर काम करने की बात कहती हैं। साथ ही खुद को पश्चिमी इलाहाबाद की बेटी कहकर समाजवादी योजनाओं को बताते हुए सपा और अखिलेश यादव को दोबारा सत्ता में लाने की बात करती हैं।

ऋचा का राजनीति सफर पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शुरू हुआ था। वह 2015 से 2016 तक छात्र संघ की अध्यक्ष रही थीं, और यहाँ की पहली महिला अध्यक्ष बनी। ऋचा अपने अध्यक्ष बनने की राह के बारे में गर्व से बताती हैं कि इस विश्वविद्यालय के 128 सालों के इतिहास में आज तक कोई महिला अध्यक्ष नहीं बनी थी। साथ ही लोगों का कहना था कि यहां कोई महिला अध्यक्ष बन भी नहीं सकती है। यहीं नहीं लोगों ने उनकी जीत को किस्मत अच्छी कहकर टाल भी दिया। साथ उनसे अध्यक्ष का काम नहीं होने की बात भी कही गयी। ऋचा को तब पता चला कि उनका मुख्य संघर्ष जीत के बाद शुरु हुआ है।

ऋचा को विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के तौर पर काम करने के दौरान करीब 10 नोटिस मिले, पर ऋचा उन सबसे नहीं डरी। ऋचा इसका कारण पितसत्तात्मक सोच को मानती है। उनका कहना है, “सारी पावर पुरुष अपने पास रखना चाहतें हैं। इस स्थिति में महिला का काम करना थोड़ा मुश्किल है।” ऋचा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पद पर किए काम पर कहती हैं, “लड़कियां जीतती हैं, तो काम नहीं कर पाती हैं, पर मेरे बाद किसी भी लड़की को ये बात नहीं सुननी पड़ेगी। मैं ये बदलाव करके आई हूँ।” ऋचा इस ही बदलाव को छात्र राजनीति से क्षेत्र राजनीति में भी लाना चाहती हैं, जहाँ आज भी महिलाओं की भारी कमी है।

इस सीट में 10 सालों से बसपा का दबदबा था, इस सीट पर 2005 में बसपा के विधायक राजूपाल जीते थे पर जीत के कुछ दिनों बाद ही उनकी हत्या हो गई, जिसके बाद उनकी पत्नी पूजा पाल को जनता सहानुभूति के कारण 10 साल तक ये सीट मिलती रही। पर अब ऐसा बोला जा रहा हैं कि पूजा पाल की इस क्षेत्र में अनदेखी के कारण ऋचा की जीत की राह आसान बन सकती है।  

ऋचा ने 2016 में सपा की सदस्यता ली। वह सपा से जुड़ने का कारण समाजवादी सोच को बताती हैं।ऋचा सपा को समाज के हर तबके लिए काम करने वाली पार्टी कहती हैं।

सपा से ऋचा को टिकट मिलना बसपा के लिए एक झटके सा है, क्योंकि ऋचा एक महिला उम्मीदवार हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र राजनीति के गलियारों से निकालकर अब मुख्य राजनीति में आ रही हैं। ऋचा के आने से बसपा विधायक पूजा पाल की राह आसान नहीं होगी।

वहीं भाजपा ने सिद्धार्थ सिंह को यहां से उतारा हैं। ऋचा और सिद्धार्थ सिंह दोनों की छवि साफ सुथरी है। इस सीट का जातिगत गणित समझे तो यहां 65 हजार पिछड़ी जाति के हैं और 85 हजार मतदाता अल्पसंख्यक हैं, जो किसी की भी जीत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अब देखना ये है, क्या ऋचा सिंह इस सीट पर अपनी जीत के दाव को सच कर पाएंगी।

रिपोर्टर- रिज़वाना तबस्सुम 

 

03/02/2017 को प्रकाशित