लक्ष्मी पांडा की अंतिम लड़ाई

लक्ष्मी उन अनगिनत ग्रामीण भारतीयों में से एक हैं, जिन्होंने देश को आजाद कराने में कई लड़ाईयां लड़ी। वे ईमानदार लोग थे, जिन्होंने बड़ी कुर्बानियां दीं और जब देश स्वतंत्र हो गया तो अपने दैनिक जीवन की ओर लौट गए।  लक्ष्मी उन अनगिनत ग्रामीण भारतीयों में से एक हैं, जिन्होंने देश को आजाद कराने में कई लड़ाईयां लड़ी। वे ईमानदार लोग थे, जिन्होंने बड़ी कुर्बानियां दीं और जब देश स्वतंत्र हो गया तो अपने दैनिक जीवन की ओर लौट गए।   लक्ष्मी 13 साल की आयु में ही आईएनए में शामिल हो गई थीं और अब जाकर वह 80 साल की होने वाली हैं। ओडिशा राज्य लक्ष्मी पांडा को एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्वीकार करता है और इसलिए उन्हें हर माह मामूली 700 रुपये पेंशन के मिलती है। पिछले साल इसमें 300 रुपये की वृद्धि कर दी गई।  लक्ष्मी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के सबसे कम उम्र सदस्यों में से एक थीं। वह ओडिशा की शायद एकमात्र महिला, जिन्होंने आईएनए में अपना नाम लिखवाया और तत्कालीन बर्मा में स्थित शिविर में शामिल हुईं। जाहिर है, वह एकमात्र ऐसी जीवित महिला हैं। खराब स्वास्थ्य और गरीबी ने कुछ साल पहले उनकी कमर तोड़ कर रख दी। लोगों को इसके बारे में तब पता चला, जब जयपूर के एक युवा पत्रकार, परेश रथ ने पहली बार यह खबर लिखी। रथ उन्हें उनकी झोंपड़ी से उठाकर अपने एक कमरे वाले निवास पर ले आए और वह भी अपने पैसे से, साथ ही उन्होंने उनका इलाज भी कराया। रोग के कारण पांडा को हाल ही में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल वह अपने बेटे के घर पर हैं।

साभार: पारी, 06 जुलाई 2017