रोटी, पानी, राशन और राहत के झूठे वादों से जूझते लोगों पर प्रशासन मौन!

प्रधान के घर के बाहर चावल और गेंहूं फैले पड़े हुए थे। पास ही कोटेदार और प्रधानपति इस नजारे को देख कर भी अनजान बन रहे।
प्रधान के घर के बाहर चावल और गेंहूं फैले पड़े हुए थे। पास ही कोटेदार और प्रधानपति इस नजारे को देख कर भी अनजान बने रहे।

जिला महोबा, ब्लाक कबरई, गांव बिलरही पूरा बुंदेलखंड एक तरफ जहाँ सूखे की मार झेल रहा है वहीँ, खाद्यान पूर्ति न होने के कारण गांव के लोग दो वक़्त की रोटी के लिए मोहताज हो गये हैं। हाल ही में इस गांव में अखिलेश यादव दौरे पर आये थे और गांव में सूखा राहत चैक संग खाद्यान पैकट बांटे गये थे। लोगों को राशन कार्ड सुविधा के अंतर्गत अंत्योदय कार्ड धारियों को विशेष रूप से खाद्यान पैकट उपलब्ध कराये जाने थे लेकिन भ्रष्टाचार और दलाली के चलते यह कार्य मुनाफाखोरों के जाल में फंस कर रह गया।

हालिया इस गांव में खबर लहरिया ने जांच-पड़ताल की। हालत ऐसी थी कि सरकारी कागजों में और जमीनी हकीकत में दूर-दूर तक कोई मिलान नहीं हो पा रहा था। एक तरफ जहां गांव के लोग खाने-पीने के लिए परेशान हैं वहीं प्रधानपति के दरवाज़े पर अनाज पैरों से घसीटा जा रहा था।
गांव में प्रवेश करने पर एक बड़े बरगद के नीचे कई बुजुर्ग बैठे मिले और पास ही लगे हैंडपंप पर कुछ औरतें पानी भरती नजर आई। एक साथ चार बर्तन, लम्बे घुंघट में, सर से लेकर पांव तक भीगते हुए, ले जाती दिखती हैं। यह शायद यहां रोज का नज़ारा होगा, पुरुष बैठें हैं और लगभग हर उम्र की औरतें अपनी क्षमता से ज्यादा पानी ढो कर ले जाती हैं।
wwwwwइसी बीच गांव के लोगों से हुई बातचीत ने हमें हकीकत से रु-बा-रु कराया। सूखा राहत चैक के बारे में पूछने पर गांव निवासी रामसिंह ने बताया कि “मेरे परिवार में सात लोग, तीन जानवर और 7 एकड़ की पूरी जमीन सूखी पड़ी है। पिछले साल एक चैक मिल गया था वो भी इतना कम कि उसे ओढ़ू के बिछाऊं समझ नही आता। किसान था और अब मजदूरी करने को मजबूर हो गया हूं।”
सुमेरा इस गांव के बुजुर्गों में से एक हैं। उन्होंने अपनी उम्र में यह पहला विकराल सूखा देखा है। वह बताते है की सन् 1994 एक बार सूखा पड़ा था। लेकिन उस समय बारिश ने फिर से सब हरा-भरा कर दिया था पर इस बार कोई आसार नजर नहीं आते। अभी तक हम पुराने अनाज से ही काम चला रहे थे लेकिन आगे के लिए कुछ नहीं है। हमारे पीले राशन कार्ड पर तो कुछ मिलता ही नहीं। इसे बदलवाया था लेकिन सुनवाई आज तक नहीं हुई। लेखपाल भी नहीं सुनता न कोटेदार, अब पूरा परिवार भुखमरी की कगार पर आ गया है।
एक अन्य किसान ने अपनी दो, साठ हजार वाली भैंसें सूखे के कारण पंद्रह हजार में बेच दीं। वहीं कुछ गांव वालों की बेटियों की शादी भी सूखे के कारण होने से रह गई।

घर के बाहर, पूरी गली में चावल और गेंहूंं फैले पड़े थे। चावल गंदा हो कर मटमैला हो गया था और गेंहू सबके पैरों में लग कर दूर तक फैलता जा रहा था। 

गांव वालों की बातें सुनने के बाद जब प्रधान के घर गये तो वहां का नजारा देखने लायक था। घर के बाहर, पूरी गली में चावल और गेंहू फैले पड़े थे। चावल गंदा हो कर मटमैला हो गया था और गेंहू सबके पैरों में लग कर दूर तक फैलता जा रहा था। ताज्जुब की बात यह थी कि उसी घर में अन्दर नोडल अधिकारी और कोटेदार दोनों प्रधानपति के साथ उपस्थित थे लेकिन उन्हें अनाज की बर्बादी होती नहीं दिख रही थी।
कोटेदार विनोद कुमारी का देवर प्रधान के दरवाज़े पर जमीन पर गल्ला और चावल फैलाये किसी दूसरे व्यक्ति से अनाज बंटवा रहा था। इस बारें में जब खुद को कोटेदार बता रहे व्यक्ति से बात की तो वह गुस्से से चीख कर बोलने लगा कि “मुझसे सवाल न करें, जा कर लेखपाल से पूछताछ करें। मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।” लोगों के लाल राशनकार्ड की सूची से नाम गायब हैं जबकि वह लाल कार्ड की श्रेणी में आते हैं।
20160430_112937 copyइन तमाम मुद्दों पर जब लेखपाल मनीराम से बात की गई तो उन्होंने बातों को घुमाते हुए कहा कि “मेरी राशनकार्ड बनाने, सूची, अनाज बांटने आदि की कोई जिम्मेदारी नहीं है, न मेरी वहां ड्यूटी लगती है। गांव का प्रधानपति दबंग है इसलिए कोई सच बोलना नहीं चाहता लेकिन सच्चाई यही है कि नाम रखना और काटना सभी प्रधान के कार्य हैं। मुझे जो सूची दी गई, मैंने उसी के अनुसार राहत पैकेट बांट दिए।”
चारों तरफ से परेशान किसान 25 किलोमीटर दूर महोबा रोजनदारी के लिए जाता है। यदि यह भी न मिले तो मजबूरन भूखा रहने को किसान विवश हो गया है। इन लोगों के हालात देख कर न प्रधान का दिल पसीजता है न ही सचिव का।
तहसील दिवस के दिन 150 ऐसी दरखास्त आई थीं जो खाद्यान संबंधी गड़बड़ियों से जुड़ी थीं लेकिन उनमें से 78 ही लिखीं गई। इनमें भी 18 कोटेदार को लेकर थीं जिन्हें अनाज नहीं दिया गया था। इनमें से सुनवाई कितनी दरखास्त की हुई? शायद यह अगली किश्त बता सके!

रिपोर्ट – प्रियंका सिंह