योगेन्द्र यादवः यूपी की सरकार जितनी निकम्मी कोई सरकार नहीं है

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14 अप्रैल 2015 को स्वराज अभियान का गठन किया गया ताकि न सिर्फ मध्यम वर्ग बल्कि कराड़ों भारतियों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को सम्बोधित किया जा सके। इसके संचालक एक्टिविस्ट-राजनीतिज्ञ योगेन्द्र यादव हैं और ये कई चीज़े होने का लक्ष्य रखता है – राजनीतिक दल, एक्टिविस्टों का संगठन, एनजीओ, विचार मंच और इसके अलावा भी बहुत कुछ।
पिछले साल जब उत्तर प्रदेश ने अपने पचास जि़लों को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया। स्वराज अभियान बुंदेलखंड के सर्वेक्षण पर निकल पड़ा। सर्वेक्षण के नतीजे चैंकाने वाले थे। वे बुंदेलखंड की खौफनाक दुर्दशा सामने लाए। इस साल जनवरी में स्वराज अभियान मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड जि़लों का एक बार फिर सर्वेक्षण करने के लिए लौटा। जिसके नतीजे इस महीने सार्वजनिक किए जाएंगे।
गोवा के एक सम्मलेन में खबर लहरिया ने योगेन्द्र यादव से सूखे, घास की रोटी और कृषि संकट पर बात की, जिन्होंने भारतीय किसान को अपंग बना दिया है। बातचीत से एक अंशः

खबर लहरिया और योगेन्द्र यादव की बातचीत का एक अंशः

स्वराज अभियान की शुरुआत कैसे हुई

स्वराज अभियान हमने 14 अप्रैल 2015 को शुरू किया। हम एक वैकल्पिक राजनीती के लिए आये है, एक और पार्टी बनाना के लिए नहीं, सत्ता के लिए नहीं। देश भर के कार्यकर्ता और आम जनता का आग्रह था की जन लोकपाल आंदोलन से देश मैं आई नयी ऊर्जा को बिखर नहीं देना चाहिए। तो हमने उस राष्ट्रीय पूंजी को बचाने के लिए स्वराज अभियान बनाया है, ऐसा औज़ार है उन उद्द्येशो को लेकर देश भर मैं बढ़ाये। लोगों ने एक उम्मीद लगायी थी, आंबेडकर जयंती  थी उस दिन, तो 14 अप्रैल से शुरू किया था।

 स्वराज अभियान मैं कितने लोग है

जिस दिन हमने स्वराज अभियान की स्थापना की उस दिन देश भर से 4000 कार्यकर्ता आ पहुंचे गुडगाँव जहाँ पहला स्वराज संवाद आयोजित किया था। लेकिन जैसे स्थापना की उसी समय हमने सदस्यता नहीं शुरू की जैसे बाकी संघठन करते है। हमने देश के 16 राज्यों मैं स्वराज संवाद आयोजित किये, एक संघठन का ढांचा तैयार किया। और बस एक महीने पहले हमने सदस्यता शुरू की है। जिस ज़िल्ले मैं कम से कम 100 सदस्य होंगे तो वहां पार्टी होगा। और जब तक 100 ज़िलों मैं इतने सदस्य न बने तब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे।

स्वराज अभियान ने सूखे का मुद्दा क्यों लिया है?

हम पहले दिन से किसान के सवाल को बहुत बड़ा सवाल मान के चल रहे है। हम लोगों का कहना है की यह शहरी चिंता से निकल कर व्यापक मुद्दे उठाने चाहिए। तो जब पहला मौका मिला तो हमने देश का सबसे बड़ा सवाल, किसान का सवाल उठाया।

हमारे लिए किसान का मतलब केवल कास्तकार नहीं है, किसान का मतलब है ज़मीन का मालिक, कास्तकार, ठेके पे काम करने वाला या बतदार किसान रहा है वह है, जो मजदूर है वह भी है। मिटटी के काम से जो भी जुड़ा है वह किसान है हमारे लिए। हमने किसान की परिभाषा का विस्तार किया है, जो कोई प्राथमिक उत्पादन कर रहा है, चाहे वह चर्मकार हो, कुम्हार हो, जो प्रकृति से अपनी मेहनत जोड़के बना रहा है यह सब व्यापकार्थी किसान है। तो एक तरह से ग्रामीण समाज के सभी लोग इस परिभाषा मैं आ जाते है।

हमने जय किसान आंदोलन के नाम से एक अभियान शुरू किया, स्वराज अभियान के अंतर्गत। मुझे उसकी ज़िम्मेदारी दी गयी। और उसके तहत सबसे पहला मुद्दा उठाया था भूमि आदिग्रहण कानून का। उस पर हमने रैली की। जब तक रैली दिल्ली मैं खत्म हुई मानसून की भविष्यवाणी निकल चुकी थी। हम पूरे मानसून मैं सूखे को देखते रहे। बिलकुल स्पष्ट था की सुख बढ़ रहा था। लेकिन यह मीडिया मैं नहीं दिख रहा था, किसी चर्चा मैं नहीं था। तो हमे लगा की लोगों के मानस तक पहुँचाने के लिए हम एक यात्रा करे। तो हमने 2 अक्टूबर से एक यात्रा शुरू की, कर्नाटक के यदिगिरी ज़िल्ले से। वहां से लेके 15 अक्टूबर तक हम हरयाणा  तक गए और यह सारे उन ज़िल्ले से गुजरे जहाँ सूखे का असर सबसे ज़्यादा था।

वहां से गुजरते गुजरते जब हम बुंदेलखंड पहुंचे तो हमारी समझ बहुत बदली। बुंदेलखंड आने से पहले लोग कहते थे की मराठवाड़ा मैं स्थिति बहुत ख़राब थी, निसंदेह ख़राब थी। वहां पे पीने के पानी का संकट बहुत गहरा है। लेकिन जो कुल मिलके सूखे का जीवन पे प्रभाव था, वहां जो स्थिति हमने बुंदेलखंड मैं देखि वैसी स्थिति तो देश मैं कहीं नहीं थी।

तो इसलिए हम लोगों ने एक सर्वेक्षण किया। पंद्रह दिन का सर्वेक्षण किया, 108 गाँव मैं गए। पोषण के मामले मैं स्थिति बहुत भयव्यय हो चुकी है और इंसान के लिए नहीं तो पशुओं के लिए तो अकाल आ चुकी है।

मराठवाड़ा के किसान और बुंदेलखंड के किसान मैं क्या फर्क है

पहले तो दोनों मैं क्या समानताये है? दोनों इलाको मैं ज़मीन बहुत पथरीली है। जिसके कारण जब भूजल का स्थल जब गिरता है तो बहुत तेजी से गिरता है, 100 फ़ीट गिरता है।

लेकिन प्राकृतिक अंतर है। प्राकृतिक अंतर यह है की मराठवाड़ा की मिटटी बहुत उपजाऊ है। मराठवाड़ा मैं सामान्यत है की सुखा नहीं पड़ता। विदर्भ मैं सुखा ज़्यादा पड़ता है, इस बार मराठवाड़ा मैं पड़ा है।

कुल मिलाके बुंदेलखंड मैं जिस किस्म की परिस्थिति बनी है, उसमे कई अंश है। पहला तो यह की बुंदेलखंड का यह एक सुखा नहीं है। पिछले साल भी सुखा था और बीच मैं ओला वृष्टि होगयी। और अब फिर सुखा। तो लगातार तीसरी बार हो रहा है।

दूसरी चीज़ यह की पिछले 15 साल मैं 8-9 बार सुख पढ़ चूका है बुंदेलखंड मैं।

तीसरा यह है की बुंदेलखंड मैं जिस तरह से जंगलों और पहाड़ों का दहन हुआ है उससे जो पर्यावरण को नुकसान हुआ है, उसने इस परिस्थिति को और विकट बना दिया है। बुंदेलखंड एक मायने मैं संपन्न हुआ करता था, लेकिन आज कहाँ है वह तालाब?

तमाम खामियों के बावजूद महाराष्ट्र की सरकार उतनी निकम्मी नहीं है जितनी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की है, और उसमे उत्तर प्रदेश की सरकार तो बेहद निकम्मी सरकार है।

पलायन वहां भी होता है यहाँ भी होता है, वहां का पलायन व्यवस्थित पलायन है। वहां का परिवार या तो कर्णाटक या नाशिक मैं गन्ने के खेत काटने जाता है। लेकिन परिवार वापस आता है तो 50000- 1 लाख रुपये कमाके लाता है। जिससे उसका गुज़ारा हो सकता है।

यहाँ बुंदेलखंड छोड़ के जाता है वह तो बिलकुल बिहाड़ि की मजदूरी, पत्थर तोड़ने जाता है। दिल्ली जायेगा, सूरत जाएगा, पंजाब जाएगा। महाराष्ट्र मैं आपको 10-15 एकड़ वाला किसान पलायन करता हुआ नहीं दिखाई देगा। बुंदेलखंड मैं दीखता है, की 20 एकड़ वाला किसान मजदूरी करने जा रहा है। यह तो सोचना मेरे लिए कल्पना से बाहर है।

जो कुपोषण की स्थिति है बुंदेलखंड मैं वह कहीं नहीं है।

कर्ज की क्या स्थिति है

कर्ज तो मराठवाड़ा मैं है और विदर्भ मैं और बुंदेलखंड मैं भी है। मराठवाड़ा मैं थोड़ी सी क्षमता है किसान का कर्ज उठाने का। बुंदेलखंड मैं तो कर्ज मिलने की क्षमता कम है।

कर्ज का बोझ तो देश मैं हर तरफ है किसान पे| देखिये कर्ज एक विचित्र चीज़ है। जहाँ किसान थोड़ा संपन्न है, वहां कर्ज का बोझ ज़्यादा है। जहाँ बिलकुल विपणन किसान है, वहां कर्ज का बोझ कम है। तो किसान की आत्मा हत्या और कर्ज का बोझ है वह सीधे सीधे विपन्नता से नहीं जुड़ा है। तो हमारे सर्वेक्षण मैं एक चौथाई लोगों ने पिछले आठ महीनो मैं अपने गहने बेचे है, बर्तन बेचे है।

किसान किसानी कैसे करे

यह भारत के किसान का सवाल है। किसानी घाटे का धंधा है। आप अपनी ज़मीन बेच दीजिये और पैसा बैंक मैं डाल दीजिये और ब्याज खाइये। कम से कम सूखे का सामना तो नहीं करना होगा।

किसान जाके सरकार को कहे की आप सारे देश का ज़मीन खरीद लो| किसान उसके मज़दूर के रूप मैं काम करे और हर महीने सरकार से पगार मांग लिया करे। फसल सरकार की, इनपुट सरकार का, खतरा सरकार का।

मुआवज़हा किस आधार पे निश्चित किया है

भारत सरकार की गरीबी रेखा जैसा मामला है यह – कोई विवेकपूर्ण कारण नहीं है।

मुआवज़हा के दो भाग होने चाहिए – एक तो किसान की लागत और जो फसल आती है उसे कितना गुज़ारा होता है, उसका जो नयोत्तम गुजरे के लिए किसान को कितना पैसा चाहिए। यह राहत है। अब मुआवज़हा का मामला है तो आपकी जितनी उपज होनी चाहिए थी उससे कितनी कम हुई है, वह है।

स्वराज अभियान का सेकंड राउंड कितना लम्बा था?

यह खत्म हो गया होगा। मध्य प्रदेश के सारे छ: जिल्लो मैं सुखा नहीं पड़ा है। वहां टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया का छोटा सा भाग। 64-68 गाँव मैं किया है, 700-800 परिवार।

घांस की रोटी का सच क्या है?

सचाई यह है की प्रश्न यह था की क्या लोग जो अपना सामान्य खाना है जैसे गेहू और चावल उसको छोड़ कर क्या सस्ता या मुफ्त मैं जो जंगली अनाज मिलता है वह खाने पे विवश है या नहीं? इसलिए नहीं की उन्हें अच्छा लगता है, इसलिए खा रहे क्यूंकि उनके पास पैसा नहीं है। यह सारी जो बेहेस हुई की पारम्परिक है, पौष्टिक है, यह सब महत्वहीन है। अगर लोग अपने पसंद से खा रहे है तो ठीक है लेकिन वह मजबूरी मैं खा रहे है।