योगी का एक साल, मंगल या दंगल?

19 मार्च 2017 को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की भागदौड़ एक भगवा धारण किए महंत के हाथ में आई। राज्य के इतिहास में ये एक परिवर्तन था, और राजनीति में परिवर्तन न होना राजनीति न करने जैसा है। एक साल नई मिशाल जैसे नारा देकर एक साल के काम को जीरे का तड़का देने का काम सरकार ने किया गया। लेकिन फूलपुर, गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पाटी की फिसलन  इस जश्न को किरकिरा कर गई।

योगी आदित्यनाथ ने अपनी कैबिनेट की पहली ही बैठक में किसानों के लिए 36 हजार करोड़ के कर्ज माफ़ी की घोषणा की। लेकिन सही तरह से माफी नहीं होने के कारण लोगों को दो रुपये तक की कर्ज माफी देकर मजाक किया गया। बुंदेलखंड के बॉदा जिले के महुआ ब्लॉक के खरौंच गांव में रहने वाले मिठाईलाल की कहानी भी कर्ज माफी की सच्चाई को बताती है। मिठाईलाल 5 बीघा जमीन वाला लघु सीमान्त किसान है। घर के आकस्मिक कामों के लिए बैंक से कर्ज लिया। लेकिन सूखा, ओलावृष्टि और पथरीली जमीन होने के कारण वे बैंक को कर्ज नहीं चुका पाए। 2003 से 2016 के बीच बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या देखें तो संख्या करीब 3674 है। आज खेती की लागत बढ़ चुकी है, जिसकारण से किसान की आय घट रही है। 2012 में समाजवादी पार्टी ने भी कर्जमाफी का ऐलान किया, लेकिन पिछली सरकार की कर्ज माफी इस सरकार के ऐलान के सामने कुछ भी नहीं थी। खैर, मुख्यमंत्री की कर्ज माफी की घोषण से मिठाईलाल भी खुश हुए और होते भी क्यों नहीं कर्ज का भार रातों की नींद जो उड़ा देता हैं। पर मिठाईलाल को कर्जमाफी का कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि उनका बैंक खाता 2016 के बाद रीन्यू हुआ था, जिस कारण से वह कर्जमाफी के दायरे से बाहर हैं। बुंदेलखंड में मिठाईलाल ही अकेले ऐसे किसान नहीं जो कर्जमाफी के लाभ से बच गए बल्कि ऐसे लघु-सीमांत किसानों की संख्या बड़ी है।

भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय वादेबाजी करते हुए डेयरी उद्योग लगाने की बात कही थी, लेकिन एक साल बाद भी इस दिशा में कुछ ठोस होता दिख नहीं रहा है। योगी सरकार के दो बजट पर गौशाला के लिए आवंटन देखें तो बजट 2017-2018 में कान्हा गौशाला व बेसहारा पशु आश्रय योजना के लिए कांजी हाउस, पुश सेल्टर होम्स बनाने को 40 करोड़ धनराशि दी थी, जो बजट 2018-19 में 98 करोड़ 50 लाख रुपये कर दी। मुख्यमंत्री ने गौ रक्षा का पूरा भार सरकार पर न लेते हुए जनता के सहयोग की बात कही थी। इसका ही कारण है कि आज बाजार की कई दुकानों में गाय के आकार के दानपत्र लग हुए हैं। बुंदेलखंड की सूखी जमीन होने के कारण लोगों को दुधेरु गाय ही पसंद है, जब वे दुध नहीं देती तो लोगा इन गायों को छोड़ देते हैं, जिसकारण से यहां अन्ना जानवर की परेशानी बड़ी मुसीबत बन गई है। दिनभर सड़कों में घूमने वाली ये गायें रात को किसानों के खेतों में चारे के लिए  आती हैं। खेतों में जब फसल होती है तो किसानों की नींद भी इन गायों को भागनें में चली जाती है। मऊ मानिकपुर के विधायक आर. के. पटेल से इस परेशानी के बारे में पूछा जाता हैं, तो वह इस समस्या को जनता से पैदा हुई समस्या बताकर इसका हल भी जनता के कंधों में डाल देते हैं। बिना ये सोचे कि उन्होंने इसका हल निकलने के नाम पर ही वोट पाए थे। इस समय चित्रकूट जिले में जो सात गौशाल चल रही है, वे सब जनता के सहयोग से ही है।

अब बात महिला सुरक्षा पर करें तो महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बना ऐंटी रोमिया दल भी लोगों की मुसीबत बन गया। बिना पुलिस को ट्रेनिंग दिए हड़बड़ी में ये फरमान जारी तो कर दिया, पर ये पुलिस का आम जनता को उत्पीड़त करने का एक हथियार बन गया। ऐंटी रोमियो दल के मुख्य पर्यवेक्षण अधिकारी डॉ राकेश कुमार मिश्रा कहते हैं कि कोई मानक नहीं है, मनचलों को पकड़ने का पर गलत और सही तो देखकर समझ आ जाता है। वहीं बांदा के जवाहर नगर में रहने वाली सीमा एंटी रोमियो पर कहती हैं कि पुलिस वालों को कैसे पता चल सकता है, कि ये रोमियो है। वहीं तरुण विकास संस्थान की कार्यकर्ता उमा कुशवाहा कहती हैं कि एंटी रोमियो नाम से ही साफ हो रहा है कि ये प्यार के विपरीत है। अब बचाव ही वार करने लगे तो उस तलवार को हम क्या कहें।

मुख्यमंत्री का एक साल प्रदेश में कोई मिशाल नहीं है, बल्कि एक सबक है, क्योंकि काम बहुत हैं और समय कम। जनता ने उपचुनाव में कुछ हद तक इसके संकेत भी दे दिए हैं। अब प्रदेश सरकार के ऊपर है कि वह इसे कैसे ले।

ऐंटी रोमियो पर एक कड़ी नज़र, मंगल कम, दंगल ज़्यादा
गौरक्षा पर सरकारी काम बेहाल, देखें सच बुंदेलखंड की जमीन से
कर्जमाफी की कोई और ही कहानी बयां कर रहा है यह विडियो, क्या बस घोषणाओं की ही है यह सरकार?

साभार: अल्का मनराल