ये हमारा खानदानी पेशा है , पहले पिताजी करते थे अब हम करते है : राम कुमार राजपूत

जिला ललितपुर, गांव भौरा आज के समय में संगीत पे कोऊ ध्यान नई देत लेकिन एक एसो परिवार आज भी हे जो आज भी अपनी पैत्रिक संपत्ति को काम कर रहे।
रामकुमार राजपूत ने बतायी के हारमोनियम को काम पहले हमाये बाप करत ते अब हम करन लगे। हमाये इते जो काम 1995 से हो रओ। हमाय बाप ने हम ओरन को जो काम दुकान पे सिखाओ तो। हमाय ते हारमोनियम तबला,झीका, ढोलक,आदि बनात और सुधारत। हम जो काम दस पन्द्रह साल से कर रये। हम तीन भज्जा है जीमे से हम और हमाओ छोटो भज्जा संगीत को काम करत। और अबे भी हमाय बाप भी करत
एक हारमोनियम बनाबे में छह सात दिन लाग जात। हारमोनियम बनाबे के लाने लकडिया मेरठ से लेयात। एक हारमोनियम में कम से कम चार हजार कि लागत लगत। जीमे दो हजार लकडिया कि लागत होत चीरबाई कट्बाई भराई। हारमोनियम हर प्रकार कि बनात। चार हजार कि पांच हजार कि दस हजार कि बीस हजार तक कि बनत है। इनमे बचत कम होत। जो नई हारमोनियम बनात उनमे तो बचत न के बराबर होत। अब बनात जा से है जी से अपनी दुकान बनी रये धंधो न ख़राब होबे। और जो कछु बिक्री होत बई बिलात हे। काय के इते और दुकाने न होबे के मारे संगीत पिछलत चलो जा रओ।
हम ओरन कि सोच है के आदमियन के पास हरमोनियम जाये ढोलक झीका जाबे संगीत होबे तो बा से अच्छे विचार पैदा होत। अपनी संस्कृति को भी मान संगीत हे।

रिपोर्टर-  राजकुमारी 

 

30/08/2016 को प्रकाशित