यू.पी. की हलचल – जेल वाई फाई….क्रिमिनल हाई फाई

आँचल लखनऊ के जाने-माने अखबार में बतौर पत्रकार काम करती है। पिछले सात आठ सालों से वे पत्रकारिता कर रही हैं।

आजकल लखनऊ जेल में बंद एक साहब अपने लिए ‘जस्टिस’ यानी न्याय मांग रहे हैं, वह भी फेसबुक पर बाकायदा ‘जस्टिस फॉर अमन’ यानी अमन के लिए न्याय शीर्षक से एक पेज बनाकर। उनके पर्सनल फेसबुक स्टेटस भी दर्द भरे नगमों से ऽभरा हुआ है। खैर उन्हें ‘जस्टिस’ मिलना न मिलना तो बाद की बात है लेकिन सवाल यह उठता है कि जेल से फेसबुक इस्तेमाल कैसे हो रहा है? अब इसका तो यही मतलब होता है कि जेल ‘वाई-फाई’ है और अंदर बंद क्रिमिनल ‘हाई-फाई’…यानी जेल के अंदर हाई फाई अपराधियों को बड़े मजे से इंटरनेट मिल रहा है।

दरअसल आईपीएस अमिताभ ठाकुर बनाम यूपी सरकार और आजम खान की भैंसों के बाद यूपी में आजकल सबसे ज्यादा चर्चा में यही मामला है। कुछ साल पहले ‘मधुमिता हत्याकांड’ सुर्खियों में था, जिसके चलते यहां के बाहुबली टाइप नेता अमरमणि त्रिपाठी अब तक जेल में बंद हैं। अब उन्हीं के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए उनके सुपुत्र अमनमणि त्रिपाठी अपनी पत्नी सारा सिंह की हत्या के आरोप में सरकारी मेहमान बने हुए हैं।

15 जुलाई को हुआ कार एक्सीडेंट इतना भीषण था कि इसमें अमनमणि की पत्नी सारा सिंह की मौत हो जाती है लेकिन ताज्जुब ये कि उसी कार में मौजूद अमनमणि को खरोंच तक नहीं आती। इनके रिश्ते की परतें तब खुलनी शुरू होती हैं जब सारा की मां यह आरोप लगाती हैं कि उनकी बेटी की हत्या की गई है। मां का बयान और सारा और अमनमणि के फेसबुक स्टेटस बताते हैं कि इनकी शादी दम तोड़ चुकी थी और सारा इस रिश्ते से आजादी चाहती थी। मगर अमनमणि को शांति से मसला सुलझाने के बजाए सारा को हमेशा के लिए आजाद करना ज्यादा आसान लगा। एक्सीडेंट में मौत का ताना बाना बुना गया, सारा से छुटकारा भी मिल गया और जब लगा कि एक्सीडेंट हत्या साबित साबित हो सकता है तो राजनीतिक दांव-पेंच इस्तेमाल करके अपने लिए सहानुभूति जुटाने की जुगत शुरू हो गई। अमन के एक शुभचिंतक ने तो यहां तक कह दिया कि, ‘भइया जिस पर जान देते थे उसी की जान लेने का आरोप क्यों लगाया जा रहा है?’ बात यह है कि सारा की हत्या हुई या वह एक्सीडेंट में मरी, यह तो कोर्ट तय करेगा लेकिन अपनी ही पत्नी की मौत पर इतनी लीपापोती अमन के दोगले व्यक्तित्व का चेहरा तो दिखाती ही है। जिस तरह जेल में उसे सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं और बाहर सपा कार्यकर्ता उसके लिए ‘जस्टिस कैम्पेन’ यानी न्याय के लिए आंदोलन चला रहे हैं, उससे यूपी सरकार की भूमिका पर भी संदेह तो होता ही है।